78 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हैं और उनकी सेवाएं ही भारत तथा विश्व के लिए एक बड़ी उपलब्धि हैं। ख्3,
स्वागत भाषण के उत्तर में डॉ. अम्बेडकर ने कहा ‘‘वर्तमान में मैं इस हिन्दू भारत में सबसे घृणित व्यक्ति हूं। मुझे एक देशद्रोही की संज्ञा दी जाती है तथा हिन्दुओं का शत्रु बताकर बदनाम किया जाता है। मुझे हिन्दू धर्म का विनाशक तथा देश का सबसे बड़ा शत्रु कहा जाता है। परन्तु मेरी इस बात का विश्वास करें कि कुछ समय बाद गोलमेज अधिवेशन की प्रकाशित रिपोर्ट का निष्पक्ष अध्ययन इतिहासकारों द्वारा किया जाएगा तो भविष्य में आने वाली हिन्दू पीढि़याँ मेरी देश सेवा की प्रशंसा करेंगी। अगर वे इसे स्वीकार न भी करें तो मुझे इसकी कोई चिन्ता नहीं। उन्होंने बड़े शांत भाव से यह कहते हुए समापन किया, कि मेरी बड़ी सन्तुष्टि इसमें है कि दलित वर्ग की मेरे काम के प्रति अव्यक्त आस्था है और वे मेरे लक्ष्य प्राप्ति में अविभाजित मेरे साथ खड़े हैं। मैं दलितों के यहां पैदा हुआ, उन्हीं में मेरा पालन पोषण हुआ व उन सबके बीच मैं रह रहा हूं, उस दलित वर्ग की मरने तक भी सेवा करने तथा उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ने की पूर्ण गंभीरता से प्रतिज्ञा करता हूं। मैं अपने सही उद्देश्य के मार्ग से तनिक भी विचलित नहीं होऊंगा और हिंसक तथा मुझे नीचा दिखाने वाले अपने निंदकों की आलोचनाओं की परवाह नहीं करूंगा। ख्1,
डॉ. अम्बेडकर के भाषण में कई अतिरिक्त पहलू भी थे जो ’’बम्बई क्रानिकल’’ समाचार पत्र में छपे थे। वे पहलू इस प्रकार हैं -सम्पादक
डॉ. अम्बेडकर ने उत्तर देते हुए कहा, मुझे अपने लोंगों के लिए ‘‘मुझे न मंदिर चाहिए, न पानी के कुएं चाहिए और न ही अंतर्जातीय भोज। मुझे तो केवल सरकारी नौकरी, अनाज, कपड़े, शिक्षा व दूसरे सुवअसर चाहिए।’’
वर्ण व्यवस्था के अतिरिक्त भी कई भिन्नताए बनाई गई हैं जैसे शिक्षा में गुण भेद। इनके लिए राजनीतिक सुधारों की आवश्यकता है। इस कारण अब उन्हांने अपने विचारों में परिवर्तन किया था और अब उन्हें विश्वास हो गया था कि सामाजिक सुधारों से पहले राजनीतिक सुधारों की आवश्यकता है।
इसलिए अब वे समुदाय के लिए फिलहाल पृथक निर्वाचक मंडल पर विशेष दबाव बना रहे थे जबकि राव बहादुर राजा और गवई संयुक्त निर्वाचक मंडल की वकालत कर रहे थे।’’ ख्2,
312 जनता : 25 जून, 1932 कीर, पृष्ठ सं. 201-202 बम्बई क्रॉनिकल, 23 मई, 1932