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होता तो दूसरों का दिमाग ठीक करने का कोई बेहतर हथियार नहीं होता। लेकिन यह ऐसा विचित्र दुधारी शस्त्र है कि जिसके कारण दुश्मन के साथ-साथ खुद पर भी वार होता है। जो लोग बहिष्कार की धमकी देते हैं, वे नहीं जानते कि बहिष्कार शस्त्र एकतरफा नहीं दोहरा है या उन्हें गलत समझ हो गई है कि अस्पृश्य समाज परजीवी है और स्पृश्य समाज उसका पोषण कर रहा है। अन्य समाजों की रचना भी विनिमय पर ही आधारित है। ऐसी स्थिति में किसी को बिल्कुल भी यह नहीं मानना चाहिए कि कोई किसी पर उपकार कर रहा है। मालिक नौकर को नौकरी पर रखता है तो मालिक बहुत अहंकार से कहता है कि तुम मुझ पर कोई उपकार नहीं कर रहे। मगर नौकर भी दृढ़तापूर्वक यह कह सकता है कि मैं उपकार नहीं कर रहा यह सही है मगर तुम भी मुझ पर उपकार नहीं कर रहे। जो काम आदमी
खुद कर सकता है वह काम वह आमतौर पर और किसी से नहीं कराता। अपने से काम न हो पाने के कारण ही दूसरे की जरूरत पड़ती है। मालिक ने संबंध तोड़े तो नौकर परेशान हो जाएंगे लेकिन नौकर ने संबंध तोड़े तो पास में पैसा होकर भी मालिक को परेशानी उठानी पड़ेगी। कुल मिलाकर बात यह है कि एक आदमी को दूसरे आदमी की जरूरत महसूस होती है, इसलिए ही आपस में संबंध बनाते हैं और स्वार्थ के आधार पर बने इन संबंधों को कोई आसानी से तोड़ नहीं पाता क्योंकि उससे दोनों पक्षों का नुकसान होता है। यही बात स्पृश्य और अस्पृश्यों के रिश्तों पर भी लागू होती है। अस्पृश्य लोग स्पृश्यों की नौकरी करते हैं तो यह नहीं कहते कि स्पृश्यों पर उपकार कर रहे हैं। उसी तरह स्पृश्यों को भी यह घमंड नहीं करना चाहिए कि वो अस्पृश्यों को पालपोस रहे हैं। दोनों के संबंध शुद्ध स्वार्थ के हैं। दोनों का एक दूसरे के बगैर चलता नहीं। इसलिए दोनों बेकाबू नहीं होते। इस तरह की व्यवस्था के द्वारा जुड़े हुए लोग एक दूसरे का बहिष्कार नहीं कर सकते और यदि किया भी तो वह ज्यादा समय तक टिक नहीं सकता।
स्पृश्य और अस्पृश्यों के आर्थिक संबंध भले ही आपसी स्वार्थ की भावना पर आधारित हों फिर भी इन दोनों वर्गों की धारण-पोषण शक्ति में थोड़ा बहुत फर्क है, यह मानना जरूरी है। इस कारण एक दूसरे के लिए जितना मारक हो सकता है, उतना पहला दूसरे के लिए मारक नहीं हो सकता। जिनकी धारण-पोषण शक्ति कम दर्जे की है उन्हें अगर ज्यादा धारण-पोषण शक्ति वाले लोगों के साथ संघर्ष करना पड़ा तो उस संघर्ष को आखरी परिणती तक ले जाना मुश्किल होता है। क्योंकि जिनकी धारण-पोषण शक्ति कम है उनके सामने सवाल होता है कि ‘बलवान से संघर्ष मोल लेकर कैसे निभेगी’, यह सवाल उठने पर श्रेष्ठ धारण-पोषण शक्तिवालों का विरोध करके जो श्वाशत हित प्राप्त करना होता है उसे भी छोड़ देना पड़ता है। इसका उत्कृष्ट उदाहरण महाभारत में देखने को मिलता है। कौरवों और पांडवों