84 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
की सेनाएं कुरूक्षेत्र में युद्ध के लिए सज्ज होने पर युद्ध की शुरूआत होने से पहले युधिष्ठिर को लगा कि भीष्म, द्रोण और शला जैसे महापुरुषों की चरण वंदना करके उनके आशीर्वाद लिए जाएं और समरांगन में वह अपना कवच उतारकर विनम्रता पूर्वक उनके पास गया। शिष्टाचार का पूरी तरह से पालन करने वाले युधिष्ठिर को उन्हें आशीर्वाद तो देना ही था, मगर आशीर्वाद देते हुए उन्हें अपनी स्थिति का एहसास हुआ और उन्हें लगा कि युधिष्ठिर शायद सवाल करें कि आप मानते हैं कि हमारा पक्ष सत्य का है और कौरवों का पक्ष असत्य का है। फिर आप सत्य के पक्ष की तरफ से क्यों नहीं लड़ते? इस विचार से मन ही मन में वे शर्मिंदा हुए और इस सवाल के पूछे जाने से पहले ही उन्होंने युधिष्ठिर से कहा -
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”अर्थस्य पुरुषों दासोदाससत्वर्थो न कस्यचित्।
इति सत्य महाराज बद्धो स्म्यर्थेन कौरवेः।।“
”मनुष्य अर्थ का दास है, अर्थ किसी का दास नहीं है। यह वास्तविकता होने के कारण हे महाराज युधिष्ठिर, कौरवों ने हमें अर्थ से बांध डाला है।“ हमने ऊपर बताया है कि ऐसा कहने की नौबत अस्पृश्यों पर नहीं आएगी। लेकिन यदि आई तो इस बात का विचार करना उपयुक्त होगा कि उसकी धारण-पोषण शक्ति टिकी कैसे रहेगी और वे स्वावलंबी कैसे बनेंगे? इसलिए हमने आज इस विषय पर विचार प्रकट करना तय किया है।
पहले अस्पृश्य जातियों में जिन अनेक जातियों का समावेश हुआ है उन जातियों में से किन-किन जातियों को बहिष्कार से विशेष कष्ट पहुंचने वाला है, इस बात पर हमें ध्यान देना होगा। चमार और ढोर व्यवसायिक जातियां हैं सो जाहिर है कि उन पर बहिष्कार के शस्त्र का कोई खास वार नहीं होगा। उल्टे, अगर उन्होंने स्पृश्यों पर बहिष्कार डाला तो, नए जूते बनाना या पुरानों को ठीक करना छोड़ दिया तो उनका कैसे चलेगा? उसी तरह मांग लोग भी व्यवसायी हैं। उन्होंने सुतली, रस्सियां या झाडू बनाना बंद किया तो उनके कारण सभी स्पृश्य लोगों की हेकड़ी निकल जाएगी। क्योंकि किसानों की महत्वपूर्ण जरूरतों में से दो जरूरतें हैं - बैल की लगाम और मोट या चरसे का नाड़ा। ये चीजें सिर्फ मांग जाति के लोग ही बनाते हैं सो उन्हें बहिष्कृत करना स्पृश्य लोगों के हित में नहीं होगा। उल्टे अगर इन लोगों ने स्पृश्यों को बहिष्कृत किया तो स्पृश्य लोगों को उनके सामने झुकना ही पडेगा। भंगी लोग तो स्पृश्यों को पल भर में झुका सकते हैं। उनका धंदा भले नीच माना जाता हो, लेकिन उसकी उपयोगिता इतनी जबरदस्त है कि वे अगर चाहें तो पूरे शहर में रोग फैला कर सारी बस्ती को ही नामशेष कर सकते हैं। अब देखते हैं महारों की स्थिति क्या है? महारों की जाति का कोई विशेष व्यवसाय नहीं है। भले आखिरी पायदान