15. अस्पृश्यों की उन्नति की आर्थिक बुनियाद - नवंबर 1927 सोलापुर - Page 99

82 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

तो मनुष्यता को गौरवान्वित करने वाले काम दुनिया में होते ही नहीं। पशु सामान्य स्वास्थ्य पाकर संतुष्ट हो सकता है। लेकिन मनुष्य और पशु में आहार, निद्रा, भय और शारीरिक धर्म भले ही समान हों, लेकिन भगवान ने बुद्धि रूपी उपहार मनुष्य को विशेषरूप से दिया है। बुद्धि जब जागृत नहीं होती, तब मनुष्य पशु ही होता है। वह केवल स्वस्थ होकर संतुष्ट हो सकता है। लेकिन जिसकी बुद्धि जागृत होने के कारण जिसे जीवंतता का अनुभव हो चुका है, ऐसे व्यक्ति को यह स्मशान शांति रास आना संभव नहीं है। उसे फैसला करना पड़ता है कि उसे केवल सस्वास्थ्य चाहिए या बुद्धि द्वारा तय किया हुआ ध्येय चाहिए। अस्पृश्य वर्ग अब जागृत हो गया है। उस पर मात्र स्वास्थ्य या समता में से किसी एक के पक्ष में फैसला करने की नौबत आने वाली ही थी और आज वह आ गई है और उसने समता को प्राप््त करने का निश्चय कर लिया है। हमें विश्वास है कि जागरूक बन चुकी अस्पृश्य जनता अपनी प्रगति, अपने आगे बढ़ते कदमों को रोकने वाली सारी बाधाओं को दूर करने के लिए आवश्यक त्याग करेगी और इतना ही नहीं तो अपने प्राणों की कुर्बानी देने को तैयार होगी। इस स्थिति तक गई जनता बहिष्कार से क्या डरेगी? और जिन्होंने सोच-समझ कर इस घोर तपस्या का मार्ग चुना है उन्हें चेतावनी देने से क्या होगा? इन विघ्नसंतोषी लोगों के सत्याग्रह के खिलाफ बहिष्कार के डराने वाले घंटानाद परेशान होने की, घबराने की कोई वजह नहीं है। कारण यह है कि बहिष्कार जैसे आत्मघाती हथियार को कोई लंबे समय तक हाथ में नहीं पकड़ सकता और पकड़ ही लिया तो बहुत दिनों तक वह कारगर नहीं होता। जिस तरह अस्पृश्य लोग कहते हैं कि हम स्वीकार नहीं करेंगे कि हम अस्पृश्य हैं उसी तरह अंग्रेज लोग भी स्पृश्य लोगों से कहते हैं हम नहीं मानेंगे कि तुम स्वराज्य के योग्य हैं। जिस तरह अस्पृश्य लोगों के दिमागों को ठीक करने के लिए बहिष्कार की चेतावनी दी जा रही है, उसी तरह अंग्रेज सरकार को झुकाने के लिए स्वदेशी उर्फ विलायती चीजों के बहिष्कार की मुहिम शुरू की गई थी और वह कई सालों तक जारी थी। लेकिन सभी जानते हैं कि उससे अंग्रेज सरकार का बाल भी बांका नहीं हुआ। इसका कारण स्पष्ट है। जहां आपसी आर्थिक संबंध दाता और याचक के होते हैं वहां बहिष्कार की दवा लागू होती है, क्योंकि यदि दाता याचक का बहिष्कार करे तो दाता का कोई नुक्सान नहीं होता। लेकिन जहां संबंध दान का नहीं विनिमय का होता है वहां बहिष्कार कारगर नहीं होता। ऐसी स्थिति में बहिष्कार करने का नतीजा होता है विनिमय से होने वाले स्वार्थ, स्वहितों को डुबोना। हरेक की नजर स्वार्थ पर होने के कारण आपस में बहिष्कार करके स्वहित को डुबाने के लिए कोई तैयार नहीं होता। यदि ऐसा न होता तो मिल मालिक रोटी कमाने वाले मजदूरों का हमेशा ही बहिष्कार करते और अंग्रेज व्यापारियों का स्वदेशी के कालखंड में किया गया बहिष्कार सफल हुआ होता। ऐसा नहीं होता तो इसकी वजह यह है कि यदि बहिष्कार से केवल शत्रु को ही नुक्सान