15. अस्पृश्यों की उन्नति की आर्थिक बुनियाद - नवंबर 1927 सोलापुर - Page 102

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के क्यों न हों, लेकिन हैं वे राजपुरुष ही। क्योंकि, उनकी उपजीविका केवल सरकारी नौकरी से ही चलती है। सरकारी नौकर का न किसी के साथ लेना न देना। उसे भी बहिष्कार से कोई डर नहीं। महार भी ऐसा कह तो सकते ही हैं। लेकिन वे ऐसा तभी कह सकते हैं जब सरकारी नौकरी भली और हम भले, ऐसी स्थितियां हों तब। हालांकि, उनके दुर्भाग्य के कारण आज के हालात में वे ऐसा नहीं कह सकते हैं। इसकी प्रमुख वजह है महारों का वतन - ऐसी जागीर जिसका लगान माफ है। इसी वतन के कारण महार लोग स्पृश्यों के अधीन हुए हैं। नौकरी में जिनके तहत महारों को काम करना होता है, वे सारे स्पृश्य लोग ही होते हैं। ऐसा नहीं है कि महारों से नौकरी का काम करवाने तक ही ये लोग अपने अधिकार का प्रयोग करते हैं। वे इस बात का भी विशेष खयाल रखते हैं कि महार लोग अपनी औकात में रहते हैं या नहीं और अगर नहीं रहते हैं तो उन्हें तुरंत वे उनकी जगह बता देते हैं। इसके लिए अपने अधिकार का प्रयोग करते हैं। समय पर सरकारी काम न किए जाने की सजा मिलने वाला एक उदाहरण मिलेगा, तो उसके साथ कुछ और उदाहरण ये भी होते हैं जिनमें पाटील, मुखिया के घर की लकडि़यां न तोड़ना, मामलतदार के घोडे को घास न खिलाना, कुलकर्णियों की जमीन पर हल न चलाना, गांव की जनता को जोहार (झुक कर सलाम करना) नहीं करना, गांव में रोटी मांगना बंद किया, मरे हुए जानवर का मांस खाना छोड़ दिया, अच्छे कपडे़ पहने इसलिए आदि। इन बातों का और सरकारी नौकरी का कोई ताल्लुक नहीं। कोई मुसलमान अगर मुखिया होता या कोई पारसी अगर कुलकर्णी होता तो वतन महारों के लिए सुख की छाया बनता। वे अगर सजा देते तो सरकारी नौकरी में हुई गलती के कारण ही सजा देते। महार ने अच्छे कपड़े पहने इसलिए, रोटी मांगना छोड़ दिया इसलिए, मरे हुए जानवर का मांस खाने से इनकार किया इसलिए उन्हें सजा नहीं दी जाती। महार अगर अपना गंदा रहन-सहन बदल कर अच्छे रहें तब उनकी अवमानना न होती और न उन्हें लगता कि महार घमंडी हो गया है। लेकिन कुलकर्णी पहले मुखिया होने के कारण उस पाटील और कुलकर्णी के जोड़े को इन बातों से लगता है कि महार अपनी औकात में नहीं रह रहा और उसे घमंड हो गया है। उन्हें गुस्सा आने लगता है। इसी गुस्से के कारण वतन से प्राप्त अधिकार का गलत इस्तेमाल करते हुए वे गलत शिकायत मामलतदार के यहां भेजते हैं कि महार सरकारी काम करते नहीं है। मामलतदार उनकी हां में हां मिला कर उस शिकायत को प्रांत के पास भेजता है और प्रांत द्वारा आदेश दिया जाता है कि महार को सस्पेंड कर दें। इस तरह, अधिकारी स्पृश्य जाति के होने के कारण झूठे धर्माभिमान के शिकार होते हैं और महारों पर वतन की मार पड़ती है। और महारों को स्पृश्यों के अधीन होकर रहने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। वतन के कारण महारों को स्पृश्यों का आश्रित होना पड़ता है, उसकी एक और वजह है। महार वतनदार कामगार की हैसियत से