15. अस्पृश्यों की उन्नति की आर्थिक बुनियाद - नवंबर 1927 सोलापुर - Page 103

86 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

सरकारी नौकर हैं, लेकिन उन्हें इस काम की तनख्वाह उन्हें सरकारी खजाने से नहीं मिलती। उनकी तनख्वाह है बलुते (गांव की कुछ निम्न जातियों को गांव के लोगों द्वारा उनके काम के बदले खेती में होने वाली उपज का कुछ अंश और मांगलिक पर्वों पर जो वस्तु के रूप में वेतन दिया जाता है उसे बलुते कहते हैं। जैसे उत्तर भारत में जजमानी। और इसके लिए वे स्पृश्य लोगों पर निर्भर रहते हैं। वतन की इस व्यवस्था के कारण महार जाति स्पृश्यों पर निर्भर हो गई है। काम भले सरकार का किया हो, लेकिन उस काम की तनख्वाह दी जाए अथवा नहीं इसका निर्णय गांव के लोग करेंगे। लोग भी धर्माभिमानी होने के कारण महार लोग अपनी औकात में रहते हैं अथवा नहीं इसका खयाल रखते हुए ही उन्हें बलुते अदा करते हैं। इस प्रकार अधिकारी वर्ग और लोगों की कैंची के बीच में फंसी महार प्रजा को वेतन व्यवस्था के कारण स्पृश्यों की गुलामी स्वीकारनी पड़ती है। इस गुलामी से अगर महारों को अपने आप को मुक्त करना हो तो उन्हें आर्थिक आजादी हासिल करनी होगी। इसीलिए हम कहते हैं कि पहले महार वतन व्यवस्था में सुधार कीजिए। उनमें से पहला सुधार यह किया जाना चाहिए कि अगर अपने पास की जमीन पर लगान देकर वे जमीन रख सकें तो वतनी नौकरियां वे छोड़ दें। इससे एक साथ स्पृश्यों के अधीन और स्पृश्यावलंबी बनी महार प्रजा आर्थिक स्तर पर आजाद होगी। इतना अगर कर भी नहीं सके तब भी वे प्रजा (जनता) से बलुते लेने के बदले सरकार से तनख्वाह मांगें। इससे वह भले स्पृश्याधीन रहें लेकिन स्पृश्यावलंबी नहीं रहेगी। यह सुधार अगर हो जाए तो महारों को इस बात की चिंता नहीं करनी पड़ेगी कि बहिष्कार से उन्हें कोई दिक्कत होगी।

महार लोगों से यदि कहा जाए कि वतन छोड़ कर आप लोग आजाद हो जाएं तो वे उल्टा सवाल यह करते हैं कि वतन अगर छोड़ दिया जाए तो हमारी आमदनी कैसे होगी? असल में महार लोगों को इस सवाल से परेशान नहीं होना चाहिए। पैदा होते समय हर इंसान अपने लिए पेट भरने का साधन साथ लेकर नहीं आता। पैदा होने के बाद अपनी योग्यता के अनुसार वह कोई न कोई व्यवसाय अपना कर अपना पेट पालता ही है। फिर महार लोग ही अपना पेट नहीं पाल सकेंगे, ऐसा कैसे हो सकता है? आर्थिक आजादी के लिए हम उन्हें एकाध-दो सूचनाएं और दे रहे हैं। महार लोगों को हमारी पहली सूचना यह है कि आप अपनी अलग बस्तियां बसाएं। महार लोगों को गांव के बारे में बड़ा अभिमान है। पिता का गांव छोड़ कर जाना चाहिए या नहीं इस सवाल का वे पार पाने में कठिनाई महसूस करते हैं। जहां अपने पिता गुजरे वहीं खुद भी गुजर जाने की उनकी इच्छा होती है। यह उन्हें अपना कर्त्तव्य है ऐसा लगता है। गांव अगर उनके साथ आदर से पेश आता तो उनका इस तरह महसूस करना सही भी माना जा सकता है। लेकिन महारों को जहां गांव के लोग