15. अस्पृश्यों की उन्नति की आर्थिक बुनियाद - नवंबर 1927 सोलापुर - Page 104

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तुच्छ, हीन मानते हैं, छोटे-छोटे कारणों से उन पर गांव बंदी लागू करते हैं, गांव के लोग जहां उनके साथ बिना गाली दिए बात नहीं करते, उसी गांव में रहने का आग्रह महार रखें यह बडे शर्म की बात है। इस प्रकार के जुल्म की कहानी गांव का हर महार जानता है। सोलापूर जिले में मासणूर, रातंजन, रालेरास, पानगांव, सुरडी, मालवंडी, चिखरडे, कासेगाव, शिरबाबी आदि गांवों में महार लोगों पर गांववासियों पर कैसे जुल्म हो रहे हैं, यह ”बहिष्कृत भारत“ के पाठक जानते ही हैं। इन गांवों में से कई गांवों ने महारों को भगा देने का निश्चय किया है और वे उस पर अमल करने की तैयारी में लगे हैं। ऐसे हालात का सामना करना महार लोगों के लिए मुश्किल होता है। क्योंकि दो-ढाई सौ घरों वाले गांव में महारों के कुल दस-पांच ही घर होते हैं। इतनी कम संख्या में होने वाले लोगों के लिए बहुसंख्यक जाति के गुंडों से सामना करना मुश्किल पड़ता है। इसलिए हर गांव में पांच-पांच या दस-दस घरों की बस्ती में रह कर इस तरह के जुल्मों का शिकार सहते हुए घुटते रहने के बजाय अलग-अलग गांवों में छोटी-छोटी बस्तियां हटा कर महारों की बडी बस्ती बसाई जाए, तो इससे उन्हें काफी लाभ मिलेगा। फॉरेस्ट (जंगलों) की जमीनों पर अगर इस तरह की बस्तियां बसाई जाएं तो वतन के जाने से होने वाला नुकसान वे खेती करके हजारों गुना पूरा कर सकते हैं। किसी की गुलामी न करते हुए आजाद तरीके से यह किया जा सकता है। ऐसी बस्तियों से न सिर्फ उदर निर्वाह होगा, बल्कि उनसे अन्य कई फायदे हो सकते हैं। गांव में रहने की वजह से महार कोई भी अन्य व्यवसाय नहीं अपना सकते। लेकिन महार अगर अपनी बस्ती अलग बसाते हैं तो उनके सामने सारी राहें खुली हो जाएंगी। महार पाटील बन सकता है, महार किराने की दुकान खोल सकता है, महार दर्जी की दुकान खोल सकता है। आज गांव में रहने के कारण जो व्यवसाय वे नहीं कर पाते, वे सब व्यवसाय अलग बस्ती में वे कर पाएंगे। अलग बस्ती बसाने का फायदा सिर्फ इतना ही नहीं है। इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण फायदा भी है। पैदा होते ही महार बच्चे के मन में छुआछूत का डर समा जाता है। इसे मत छूना, उसे मत छूना आदि शब्द बार-बार उसके कानों से टकराने के कारण बच्चा अपने आपको अपवित्र व हीन मानने लगता है और आखिर तक ऐसे ही मानता रहता है। एक बार मन पर यह दबाव बनता है तो वह हमेशा के लिए बन जाता है। मन ही कमजोर होने के कारण आगे उससे कोई पुरुषार्थ भरा काम होता ही नहीं। ऐसी नई बस्ती में बढ़ने वाले महारों के बच्चे निर्भय बनेंगे। छुआछूत की भाषा उनके कानों तक पहुंचने का कोई डर नहीं रहेगा। हम औरों से कम हैं या और लोग हमसे श्रेष्ठ हैं, यह भाव उनके मन में पैदा नहीं होगा। वे मन से कमजोर नहीं होंगे। यह बहुत बड़ा लाभ होगा। साथ ही अगर खेती के जैसे अलग उपजीविका कमाने का साधन अगर हाथ में आ रहा हो तो महार लोग उसका फायदा जरूर लें। इस तरह की नई बस्तियां बसाने