88 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
में दो तरह की मदद की जरूरत है - (1) सरकार की सहायता चाहिए; (2) महार लोग गांव छोड़ने के लिए तैयार हों। इनमें से सरकार की सहायता पाना मुश्किल नहीं है। मैसूर संस्थान में अस्पृश्य लोगों के लिए हर परिवार को सात (7) एकड़ जमीन देकर उनकी अलग बस्ती बसाई जाएगी। हमारे इलाके में भी बेरड लोगों की ऐसी ही बस्ती बनाने का अंग्रेज सरकार ने निर्णय लिया है। वही योजना महारों के लिए भी लागू करने के लिए सरकार मना करेगी ऐसा नहीं लगता। सवाल यह है कि क्या महार लोग अपना गांव छोड़ कर अलग बस्ती बसाने के लिए तैयार हैं?
सभी लोगों को खेती से पेट पालने जितनी जमीन मिलना असंभव है। इसीलिए
खेती के साथ-साथ अन्य कोई व्यवसाय महार लोग करें यह बहुत जरूरी है। महार जाति व्यवसाय करने वाली जाति नहीं है। जो व्यवसाय वह कर सके वह करने के लिए वह आजाद है। एक बात मानना जरूरी है कि पैसे और अनुभव के अभाव में श्रेष्ठ किस्म का किफायती व्यवसाय इस जाति के लोग नहीं कर पाएंगे। संभव हुआ तो कोई छोटा व्यवसाय वे अपना सकते हैं। हालांकि ब्राह्मणों की भूतबाधा से प्रभावित महार लोग किसी हीन धंधे को अपनाने के लिए तैयार होंगे इसकी संभावना बहुत कम लगती है। जिस व्यवसाय में कोई गंदगी नहीं, या कोई व्यवसाय किसी जाति विशेष का न हुआ हो ऐसा कोई व्यवसाय हो, तो महार लोग वह करने के लिए तैयार होंगे। मेरी राय में ऐसा केवल एक ही व्यवसाय है और वह है खादी बुनना। महार लोगों से मेरी सिफारिश है कि आप खादी बुनें।
उन्हें शायद अब ऐसा लगे कि हम खादी बुनेंगे तो खरीदेगा कौन? अगर कोई
खरीदे ही नहीं तो खादी बुनने का फायदा ही क्या? लेकिन इस सवाल को हल करना कठिन नहीं है। महार लोगों को अपने इस्तेमाल के लिए कपड़ा तो खरीदना ही पड़ता है। ऐसे में अगर सभी महार लोगों ने अपने लिए खादी का इस्तेमाल करने और महारों की बुनी हुई खादी के अलावा कोई और खादी न खरीदने की कसम
खाई तो बुनकर महारों के लिए अपनी ही जाति के इतने ग्राहक मिलेंगे कि उनके लिए काफी होगा। इन दो बातों पर अमल करने के लिए धन की जरूरत पड़ेगी। हालांकि आर्थिक सहायता पाना ज्यादा मुश्किल नहीं होगा। बस, महार लोगों को अपना निर्णय लेना होगा।
महारों को अगर इंसानों सी इज्जत पानी हो तो उन्हें गांव की रयतों की गुलामी से खुद को मुक्त करना होगा। और अगर वे मुक्ति चाहते हैं तो उन्हें इन सभी बातों के निश्चयपूर्वक अमल में लाना होगा। उसके अलावा उनकी राह आसान नहीं बनने वाली है, यह उन्हें ध्यान में रखना होगा।
पहले दिन का काम संपन्न हुआ। उसके बाद उसी मंडप में दूसरी सभा शुरू