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हुई। महार वतन में सुधार लाने के लिए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने जो बिल मुंबई कौंसिल में पेश किया था, उसे समर्थन देने के लिए शेठ माणेकचंद शहा की अध्यक्षता में यह सभा आयोजित की गई थी। उस सभा में आगे दिया गया प्रस्ताव रखा गया - डॉ. अम्बेडकर ने महार वतन में सुधार के लिए जो बिल रखा है, उसका यह वतनदार महार परिषद अपना पूरा समर्थन देती है।
यह प्रस्ताव श्री हरिभाऊ तोरणे ने रखा, उसे गो. गो. कांबले द्वारा समर्थन और भिमा तात्या वेसकर और निवृŸा बंदसोडे द्वारा पुष्टि किए जाने के बाद शेठ माणेकचंद ने महार वतन में लाए जाने वाले सुधारों के बिल को स्पष्ट करने के लिए डा.ॅ अम्बेडकर साहब से विनति की। उन्होंने फिर बहुत ही सरल और आसान शब्दों में इस बिल में अपने द्वारा सुझाए गए परिवर्तनों के बारे में लोगों को बताया। लोगों को वह तुरंत ठीक लगा। सभा में ही लोग आपस में बातचीत करने लगे कि डॉ अम्बेडकर साहब ने जो सुधार सुझाए हैं उनके लागू होने से वतन रूपी रौरव नरक में कुलबुला रहे हम कीड़ों का उद्धार होगा। लोगों ने डॉ. अम्बेडकर का जयकार किया। वे कहने लगे कि जो लोग कहते हैं कि यह बिल महार लोगों के लिए एक बड़ा संकट है, यह कहने वाले लोग या तो मूर्ख ही होंगे या फिर पाजी होंगे। सभा के अध्यक्ष श्री माणेकचंद ने भी बिल के पक्ष में भाषण दिया। उन्होंने लोगों से कहा कि वे अगर इस बिल के पक्ष में या विरोध में अगर कुछ पूछना चाहें तो जरूर पूछ सकते हैं। हालांकि किसी ने कोई सवाल नहीं किया। बाद में प्रस्ताव पर मतदान कराया गया तब तालियों की गड़गड़ाहट में वह पारित हुआ। बाद में सभा का काम दूसरे दिन तक स्थगित किया गया।
दिनांक 27 नवम्बर, 1927 को सुबह विषय का चुनाव करने वाली कमेटी की बैठक बुलाई गई। इस बैठक में आगे दिए जा रहे प्रस्ताव परिषद के सामने रखना सर्वानुमति से तय किया गया। परिषद के काम की रविवार 11.30 बजे डॉ. अम्बेडकर की अध्यक्षता में शुरुआत हुई।
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परिषद में आगे दिए जा रहे प्रस्ताव पारित हुए -
(1) परिषद की पक्की राय है कि, गीता में बताए गए गुणकर्म विभागशः सिद्धांत को रौंदकर उसकी जगह जन्मजाति विभागशः सिद्धांत के आधार पर समाज की रचना किए जाने से हिंदू समाज का बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। इस वजह से यह परिषद हिंदू धर्माधिकारियों को सुझाव देती है कि वे प्रचलित चातुर्वर्ण्य की कल्पना को छोड़ कर हिंदू समाज का ही एक वर्ण बनेगी इस प्रकार का नया संविधान तुरंत तैयार करने के कार्य की शुरुआत करें। इस बारे में देर या नजरंदाजी हो तो चातुर्वर्ण्य की चक्की में पिस रहे अस्पृश्य वर्ग को अपनी मुक्ति के लिए धर्मांतरण के