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बारा पाखाडी, पाली, दांडा रोड, बांद्रा के लोगों की उपस्थिति में बांद्रा में 11 दिसम्बर 1927 को शाम को चार बजे डॉ. भीमराव अम्बेडकर की अध्यक्षता में महाड़ सत्याग्रह की मदद के लिए सार्वजनिक सभा हुई। सभा के लिए सुशोभित मंडप खड़ा किया गया था। बांद्रा और आसपास के गांवों के एक हजार लोग इकट्ठा हुए थे। मुंबई से डॉ. अम्बेडकर के साथ मेसर्स शिवतरकर, प्रधान, गुप्ते, जाधव, गंगावणे, गायकवाड़,
खोलवडीकर आदि लोग उपस्थित थे। इसके अलावा बहिष्कृत हितकारिणी सभा द्वारा हाल ही में बनाए गए ‘अम्बेडकर पथक’ को खासतौर पर सभा के संचालन के लिए आयोजकों द्वारा बुलाया गया था। मुंबई के लोगों के स्टेशन पर उतरने के बाद बांद्रा वालों द्वारा उनके लिए विशेष तौरपर बुलाई मोटर से सभास्थल पर ले जाया गया। वहां पहुंचने के तुरंत बाद सभा का कामकाज शुरू किया गया। सभा के समक्ष निम्न प्रस्ताव पेश किया गया कि ”हम बांद्रा के बारा पाखाडी में रहने वाले लोग 25 दिसंबर से डॉ. अम्बेडकर के नेतृत्व में महाड़ में शुरू होने वाले सत्याग्रह को 175 रुपया चंदा दे रहे हैं। इसके अलावा यहां उपस्थित लोगों से अपील कर रहे हैं कि वे सत्याग्रह को ज्यादा से ज्यादा मदद करें।“ इस प्रस्ताव पर स्थानीय लोगों में से मेसर्स जयगुरू देवगांवकर, सखाराम भीखू, काशीराम हवालदार, गोविंद तुलसकर के भाषण होने के बाद स्थानीय नेता सोनू सजन संदीरकर ने भाषण करने के बाद 175 रुपए सहयाग राशि डॉ. अम्बेडकर को भेंट की। डॉ. अम्बेडकर ने साभार राशि स्वीकर करने के बाद भाषण दिया। उन्होंने कहा-
सज्जनों
आपके द्वारा दी गई सहयोग राशि के लिए मैं आपका आभारी हूं। आज यहां एकत्रित लोगों ने अपने पूर्वजों के पराक्रम का सिंहावलोकन किया तो हमारी गर्दन नीचे करनी होगी। कोंकण के पहले दापोली में सुभेदार, जमेदार, हवालदार आदि की बड़ी-बड़ी इमारतें, हवेलियां थीं। लेकिन मुसलमानों ने आज उन कोठी/हवेलियों को जमीनदोज कर दिया है। उन इमारतों का आपको नामोनिशान भी नहीं मिलेगा। हमारी यह दशा क्यों हुई, इस पर विचार करें। ईस्ट इंडिया कंपनी यहां आई और उस कंपनी को राज्य स्थापित करने में हमारे लोगों ने मदद की और जब तक हमारे लोग सेना में थे तब तक हम समृद्ध थे। सेना के दरवाजे बंद होते ही हमारी
* संदर्भ : ‘‘बहिष्कृत भारत’’, 23 दिसम्बर, 1927