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महाड सत्याग्रह परिषद
महाड सत्याग्रह संग्राम की तैयारी के लिए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने एक पत्रक प्रकाशित किया था। उसमें कहा गया था कि सत्याग्रह के लिए अस्पृष्य पूरी तरह से तैयार रहें। यह संदेश देने वाला पत्र इस प्रकार था -
बहिष्कृत हितकारिणी सभा की ओर से महाड में 25 दिसंबर, 1927 से सत्याग्रह शुरू होगा।
महाड़ के इस सत्याग्रह की मदद कीजिए।
”जिन्हें कुलवंत हैं, वे त्वरित (तुरंत) हाजिर हों।
उपस्थित न हों तो, आगे कष्ट भुगतने होंगे।।1।।“
सभी अस्पृश्यों को बताया जाता है कि दिनांक 25 दिसंबर, 1927 को महाड में एक सभा का आयोजन करना तय हुआ है। हो सकता है कि कुछ लोग यह पूछेंगे कि पिछले मार्च महीने की 19 तारीख को महाड में सभा ली गई थी। सो एक बार फिर उसी जगह सभा लेने में क्या तुक है? इसका जवाब है कि, चवदार तालाब का पानी पीने का उपक्रम हमारे कुछ जाति बंधुओं ने किया था, तब उनका विरोध करने वाले लोगों ने उन्हें ऐसा करने से मना करने के उद्देश्य से उनके साथ मारपीट की थी। मारपीट करने वाले स्पृश्य गुंडों को 4-4 महीनों की जेल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। दोनों पक्षों के नजरिए से यह न्यायालय का निर्णय महत्वपूर्ण है।
स्पृश्य लोगों के मन में भावना थी कि अस्पृश्य लोगों को चवदार तालाब पर पानी पीने न देना उनका अधिकार है। अब इस भावना का कोई आधार नहीं रहा। अब अगर फिर हमारी राह रोकेंगे तो उन्हें हवालात की सैर करनी पडे़गी, इसमें कोई दो राय (संदेह) नहीं। इसी प्रकार अस्पृश्यों के मन में जो भावना थी कि उन्हें चवदार तालाब पर पानी लेने जाने का अधिकार नहीं है। वह अब दूर हो गई है। वे जान गए हैं कि चवदार तालाब पर अब हमारा अधिकार प्रस्थापित हो चुका है। अगर ऐसा नहीं होता तो जिन्होंने हमें तालाब पर जाने से रोका, उन्हें सजा नहीं होती बल्कि तालाब पर जाने वालों को यानी हम लोगों को सज़ा होती। कानूनन अब हमारा अधिकार स्थापित हो चुका है। उसे हर रोज़ की दिनचर्या का हिस्सा बनाना अभी बाकी है। 25 दिसंबर के दिन जो सभा बुलाई गई है, वह इस प्रकार की दिनचर्या बनाने की आदत डालने के उद्देश्य से ही बुलाई गई है।