99
इस जुलूस में कुछ नीति पर वाक्य लिखीं बीस-पच्चीस तख्तियां थीं। ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ के स्वयंसेवक दल का बैंड बज रहा था। सत्याग्रह के गीत गाए जा रहे थे। इस तरह यह जुलूस महाड़ पहुंचा। पुलिस सुपरिंटेंडंट इस जुलूस के आसपास ही चक्कर काट रहे थे। तय रास्ते से यह थल सेना जब सत्याग्रह की छावनी के पास पहुंचा, तब श्री अनंतराव चित्रे सामने आए उन्होंने वहां से दिखाई दे रहे रायगड़ किले की ओर इशारा कर इस कार्य में यश प्राप्ति के लिए श्री शिवराय और जिजामाता का जयकार करने के लिए कहा। उस जयकार से चारों दिशाएं गूंज उठीं। सभी लोगों में वीरता का संचार हुआ। बडे़ उत्साह के साथ लोगों ने सत्याग्रह छावनी में प्रवेश किया।
| Col1 | Col2 |
|---|---|
| d | k |
|---|
| vfèko | Col2 | Col3 |
|---|---|---|
| vfèk |
पहला दिन 25-12-1927
महाड़ के स्पृश्य लोगों द्वारा योजनाबद्ध षड्यंत्र रच परिषद के कामों के लिए सामग्री न मिल पाने के बारे में पहले ही हमने बताया है। इसीलिए कार्यक्रम का पंडाल खड़ा करने के लिए जगह मिल पाना बेहद मुश्किल हो गया था। महाड शहर और आसपास की सभी भूमि गूजर ब्राह्मणों की थी। इसलिए वे बड़े खुश हो रहे थे कि परिषद करने वालों की चुटियां अपने हाथों में होने के कारण उन्हें अब नाकों चने चबाने पडें़गे। लेकिन पास ही में फŸोखान नामक मुसलमान की ज़मीन थी। उन्होंने परिषद को सभा का आयोजन करने के लिए खुशी-खुशी अपनी ज़मीन दे दी। खबर जब गूजर ब्राह्मणों तक पहुंची तब उनके हाथ-पैर ढीले पड़ गए। उन्होंने कसम खाई थी कि जो हो वे इस परिषद को होने ना दें। इसलिए उन्होंने फŸोखान के दरवाजे पर धरना दिया। अस्पृश्य लोगों को परिषद के लिए जगह न दें, यह कह कर उनके पैर पकड़ लिए। लेकिन उनकी एक न चली। दिया हुआ वचन मैं कभी नहीं तोडूंगा, यह कह कर उन्होंने उन सभी याचकों को चलता कर दिया। इस प्रकार पाई गई जगह पर 7 (सात) से 8 (आठ) हजार लोग बैठ पाएं, इतना विशाल पंडाल खड़ा किया गया था। लता-पिŸायों से उसे सजाया गया था। आसपास कुछ तख्तियां लटकाई गई थीं जिन पर निम्नलिखित घोषणाएं लिखी गई थीं-
ब्राह्मण अथवा महार हो, मैं नहीं आंकता किसी को भी कभी।
इस सृष्टि में जो दिव्य है, वह है, वह है इंसानियत।।1।।
आप ना गर्व करें, ऊंची जाति मिल कर सब।
शुक्र शोणित की खदानें, आप और हम हैं एक ही योनि जने।।2।।