100 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
विष्णुमय दुनिया वैष्णव धर्म, भेदाभेद भ्रम अमंगल ।।3।।
ईश्वरः सब भूतानांहृदयेशेऽर्जुन तिष्ठति।। 4।।
सती बनने की कसम अगर खायी जिंदगी दांव पर लगाएं।।5।।
जीतने का व्रत जिसने लिया। वह मरने के डर से पीछे ना हटे।।6।।
ऐसी कैसी छुआछूत। छूते ही होते अपवित्र।।7।।
यह धर्मयुद्ध है अब, तुम न करो तो कैसे चलेगा?
ऐसा करो तो स्वधर्म कीर्ति को डुबाओगे, पाप को स्वीकारेंगे।।8।।
मरोगे लेकिन नाम होगा, इस धरा में सन्मुख जो समस्या होगी खड़ी उस चुनौती का जमकर उसको निपटारा करना होगा।
इसलिए उठो साथियों, दृढ़ निश्चय करें पूर्णतः रण युद्ध का।।9।।
अब तक तुमने यह क्यों नहीं सोचा, किस सोच में अब पडे़ हो
स्वधर्म को भूले हो, तैर कर पार होना है जरूरी।।10।।
अंदर केवल गांधी की एक तस्वीर थी। मंडप के दरवाजे में मनुस्मृति के दहन के लिए एक बढि़या तरीके से सजी वेदी तैयार की गई थी। मनुस्मृति का दहन किए जाने के कारण जिन ब्राह्मण्य ग्रस्त लोगों को गुस्सा आया था, वे कहते फिर रहे हैं कि सत्याग्रह कर नहीं पाए, इसलिए जब आ ही गए हैं तो कुछ करना तो होगा ही यह सोच कर डॉ. अम्बेडकर ने मनुस्मृति जलाने का उपक्रम किया। असल में पंडाल
खड़ा करते समय ही मनुस्मृति जलाने के लिए वेदी भी तैयार की गई थी। जो यह जान लेंगे उनके मन में दुविधा नहीं होगी। असल में मनुस्मृति जलाने का निश्चय ऐन समय पर तय नहीं किया गया था। वह पहले से तय कार्यक्रम था। परिषद के तय कार्यक्रमों में वह शामिल था, यह आगे दी जा रही परिषद के कार्यक्रमों की सूची से जाहिर होगा।
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दिनांक 25 दिसंबर, 1927
सुबह 10 बजे अध्यक्ष का भाषण। बाद में परिषद के सभी लोग तालाब पर जाकर पानी भर कर ले आएंगे।
दोपहर 12.30 बजे भोजन। बाद में 3 बजे मनुस्मृति का दहन। समयोचित भाषण। उसके बाद अधिवेशन में उपस्थित सदस्य एक बार फिर तालाब पर जाकर पानी भर कर ले आएंगे। रात 7.30 बजे अल्पाहार। बाद में कीर्तन और सत्यशोधक तमाशा।