102 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
थे। उस वक्त महाड़ के लोगों ने भले हमें पानी भरने से नहीं रोका। लेकिन बाद में मारपीट कर एहसास कराया कि इस काम पर उन्हें आपिŸा है। उस मारपीट का अंत जिस तरह होना था उसी तरह हुआ। मारपीट करने वाले स्पृश्य लोगों को चार-चार महीनों तक जेल की सजा मिली। आज वे लोग जेल में हैं। यदि पिछले मार्च को हमारे काम में रुकावट नहीं डाली जाती तो साबित हो जाता कि इस तालाब पर पानी भरने का हक हमें भी है। यह बात स्पृश्य लोग भी मान जाते तो आज हमें यह कार्यक्रम नहीं करना पड़ता। दुर्भाग्य से यह हो नहीं पाया। इसीलिए आज की इस सभा का आयोजन करना पड़ा। महाड़ का यह तालाब सार्वजनिक है। महाड़ के स्पृश्य लोग इतने समझदार हैं कि वे खुद इस तालाब का पानी भरते हैं, ऐसा नहीं है अपितु मुसलमान आदि अन्य धर्म के लोगों को भी यहां से पानी ले जाने के लिए वे मना नहीं करते। सो, मुसलमान आदि परधर्मी लोग भी यहां से पानी भर कर ले जाते हैं। मानवों से कनिष्ठ माने गए पशु-पक्षी आदि जीवों को भी इस तालाब पर पानी पीने की मनाही नहीं है। इतना ही नहीं अस्पृश्यों द्वारा पाले गए जानवरों को भी वे यहां पानी पीने देते हैं। स्पृश्य हिंदू लोग इस प्रकार दया का मानों मूर्तिमान रूप मायका हैं। वे कभी हिंसा नहीं करते, किसी को परेशान नहीं करते। खाना बनाते समय कौआ आए तो उसे खाने वाले हाथ से न भगाने वाले कृपण या स्वार्थी लोग भी वे नहीं हैं। साधुसंतों और याचकों की संख्या में आई बढ़ोत्तरी उनके दातृत्व का जीता-जागता सबूत है। परोपकार ही पुण्य है और पर पीड़ा ही पाप है, इस सिद्धांत के अनुसार उनका बर्ताव है। इतना ही नहीं, किसी ने अगर दुःख दिया तो उसे चुपचाप सहना चाहिए“ इस कहावत के अनुसार उनका स्वभावगत धर्म है। इसीलिए वे गाय की तरह निरुपद्रवी प्राणी के साथ जिस तरह दयाभाव से पेश आते हैं उसी तरह सांप जैसे उपद्रवी कृमि-कीटों की भी वे रक्षा करते हैं। अर्थात् वे ‘सर्वांभूति एक आत्मा’, वाली बात को अपना शील बनाए हुए हैं। ऐसे स्पृश्य लोग अपने ही धर्म के कुछ लोगों को उसी चवदार तालाब का पानी लेने से मना करते हैं!! तब यह सवाल मन में आता है कि वे हमें ही भला क्यों मना करते हैं? इस सवाल का जवाब सब लोग ढंग से सोचें यह बहुत जरूरी है। उसके बगैर आज की सभा का महत्व आपको ठीक से समझ नहीं आएगा, ऐसा मुझे लगता है। हिंदुओं में शास्त्र के अनुसार चार, लेकिन रूढि़यों के अनुसार पांच वर्ण हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अतिशूद्र। हिंदू धर्म के इन यम-नियमों में से पहला नियम वर्णव्यवस्था का है। उसी धर्म के दूसरे यम-नियम के अनुसार वर्ण असमान दर्जे के हैं। एक से दूसरा हलका इस तरह उसकी रचना और क्रम है। इन यम-नियमों के कारण केवल दर्जे तय हुए हैं, ऐसा भी नहीं है। कौन किस दर्जे का है, यह पहचान में आए इसलिए हर वर्ण की सीमाएं तय की गई हैं। हिंदू धर्म में बेटी बंदी, रोटी बंदी, लोटा बंदी और मिलने-जुलने पर पाबंदी आपसी सहवास की सीमाएं हैं, ऐसा लोग समझते हैं।