17. महाड सत्याग्रह परिषद - दिसंबर 1927 महाड - Page 120

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लेकिन उनकी यह समझ अधूरी है। क्योंकि ये पाबंदियां मेल-मिलाप की सीमाएं तो हैं ही, लेकिन मूलतः वे असमान दर्जे के लोगों को उनका दरजा दिखाने के लिए बनाई गई हैं। अर्थात् मिलने-जुलने की सीमाएं असमानता के चिह्न हैं। जिस तरह सिर पर मुकुट पहने हुए को राजा माना जाता है, हाथ में धनुष हो तो उसे क्षत्रिय माना जाता है उसी तरह जिनके पास इनमें से, कोई इन पंच बंदी का कोई भी बंधन, मर्यादा न हों वह वर्ग सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इन चार बंधों ने जिसे पूरी तरह जकड़ा हुआ है उस वर्ग का दर्जा सबसे हीन माना जाता है। ये बंद कायम रखने के लिए जो कोशिश की जाती है, वह केवल इसलिए की जाती है क्योंकि धर्म के कारण जो असमानता निर्माण हुई है वह उनके कारण टूट जाएगी और उसकी जगह समानता स्थापित होगी। महाड़ के लोग अस्पृश्यों को चवदार तालाब का पानी पीने नहीं देते, वह इसलिए नहीं कि उनके छूने से पानी सड़ जाएगा या भाप बन कर उड़ जाएगा। अस्पृश्यों को तालाब का पानी पीने न देने के पीछे जो वजह है, वह यह कि धर्मशास्त्रों ने जिन जातियों को असमान करार दिया है, उन जातियों को वे अपने समान मानने के लिए तैयार नहीं हैं।

सज्जनों! हमारी इस लड़ाई का, संघर्ष का भावार्थ (आशय) क्या है यह तो इस बात से आप समझ ही गए होंगे। सत्याग्रह समिति ने आपको चवदार तालाब का पानी पीने के लिए महाड़ बुलाया है, ऐसी बात नहीं है। हम और आप चवदार तालाब का पानी पीकर अमर हो जाएंगे ऐसा भी नहीं है। और आज तक चवदार तालाब का पानी पिए बगैर भी हम जिंदा हैं ही। चवदार तालाब पर जाना है तो सिर्फ उसका पानी पीने के लिए नहीं। हम वहां जा रहे हैं तो यह साबित करने के लिए कि हम भी औरों की तरह इंसान ही हैं। यानी कि, यह सभा समानता की लड़ाई का बिगुल बजाने के लिए ही बुलाई गई है यह बात स्पष्ट है। इस दृष्टिकोण से यदि हम इस सभा के बारे में सोचेंगे, विचार करेंगे तो हर किसी को यकीन होगा कि यह अपूर्व है। आज जो हालात हैं उसका अगर हमें तोड़ चाहिए तो वह हिंदुस्तान में हमें कहीं नहीं मिलेगा। इतिहास में इस तरह की सभा का उदाहरण ढूंढना होगा, तो हमें फ्रांस का इतिहास खंगालना होगा। 138 साल पहले फ्रांस के 16वें लुई राजा ने 24 जनवरी, 1789 के दिन एक आदेश-पत्र निकाल कर अपने राज्य की प्रजा के प्रतिनिधियों की एक ऐसी ही सभा बुलाई थी। कुछ इतिहासकार इस फ्रेंच राष्ट्रीय सभा को बुरा-भला कहते हैं। उनका आरोप है कि इस सभा ने फ्रांस देश के राजा और रानी को फांसी चढाया, ऊंचे वर्ग के लोगों को जान मुट्ठी में दबा कर भागने के लिए विवश किया। और उनके कत्ल किए। बचे हुओं को देश निकाला दिया। अमीरों की धनसंपदा पर कब्जा किया और पंद्रह सालों से अधिक समय तक पूरे यूरोप में गृहकलह मचाए रखा। मेरी राय में उनके ये आरोप गलत हैं। इतना ही नहीं तो ऐसे इतिहासकारों