17. महाड सत्याग्रह परिषद - दिसंबर 1927 महाड - Page 122

105

और सामाजिक संगठन के संदर्भ में इस फ्रेंच सभा ने क्या किया, यही हमें देखना है। इस फ्रांसिसी सभा की सामाजिक और धार्मिक संगठनों के बारे में क्या नीति थी इसका पता उसके द्वारा निकाले गए तीन महत्वपूर्ण घोषणा-पत्रों से किसी को भी चल सकता है। उनका पहला घोषणा-पत्र 17 जून, 1789 को जारी किया गया। यह घोषणा-पत्र फ्रांस देश के वर्णाश्रम धर्म के संदर्भ में था। फ्रांसिसी समाज त्रिवर्णी था यह हम पहले ही देख चुके हैं। घोषणा-पत्र के जरिए त्रिवर्णी समाज व्यवस्था को हटा कर समाज को एकवर्णी बनाया गया। इतना ही नहीं राजनीतिक सभागार में इन तीन वर्णों के लोगों के लिए जो अलग-अलग बैठने की जगहें तय की गई थीं, उस व्यवस्था को खत्म कर दिया। दूसरा घोषणा-पत्र धर्मोपदेशकों के बारे में था। पुरातन रूढि़यों के मुताबिक धर्मोपदेशकों की नियुक्तियां अथवा उन्हें हटाना राष्ट्र के दायरे में नहीं था। पोप जैसे विदेशी धर्माधिकारी की ही इस मामले में चलती थी। पोप जिसे धर्मोपदेशक नियुक्त करे, वही धर्मोपदेशक बनता था। फिर जिन्हें वह उपदेश देता उनकी नजर में भले वह उस पद के लिए योग्य हो अथवा न हो! घोषणा- पत्र के द्वारा धर्माधिकारियों की इस स्वयंभू सŸा को हटा दिया गया। यह पेशा कौन अपनाएगा, इस पेशे के लिए कौन लायक है और कौन लायक नहीं है, नियुक्ति के बाद वेतन दिया जाए अथवा नहीं आदि निर्णय लेने के अधिकार घोषणा-पत्र के द्वारा फ्रांसिसी राष्ट्र को सौंपे गए। तीसरा घोषणा-पत्र राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक व्यवस्था से नहीं जुड़ा था। वह साधारण था और हर तरह की सामाजिक व्यवस्था किन सिद्धांतों के आधार पर खड़ी की जाए इस बारे में था। इस हिसाब से यह तीसरा घोषणा-पत्र बहुत महत्वपूर्ण है। अन्य घोषणा-पत्रों का यह राजा है कहें तो अत्यिक्त नहीं होगी। पूरी दुनिया में यह घोषणा-पत्र जन्म से प्राप्त मानवी अधिकारों से संबंधित घोषणा-पत्र के नाम से मशहूर हो गया। वह केवल फ्रांस के इतिहास की एक अनूठी चीज है ऐसा नहीं है। सभी विकसित राष्ट्रों के इतिहास में उसे महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ है। क्योंकि इस सभा का अनुकरण कर यूरोप के हर राष्ट्र ने अपनी राज्य व्यवस्था में उसे स्थान दिया है। इसलिए ऐसा नहीं कि उसके कारण केवल फ्रांस में ही क्रांति नहीं हुई, बल्कि उसके कारण पूरी दुनिया में क्रांति आई, ऐसा कहना योग्य होगा। इस घोषणा-पत्र में कुल 17 धाराएं हैं। उनमें से कुछ महत्वपूर्ण धाराएं आगे दे रहे हैं -

(1) सभी इंसान जन्म से समान होते हैं और मृत्युपर्यंत समान दर्जे के ही रहेंगे।

जनहित के कारणों से ही उनके दर्जे में अंतर (भेद) किया जा सकता है। बाकी

मामलों में सभी का दर्जा एक समान होना चाहिए।

(2) उपरोक्त जन्मसिद्ध अधिकारों को कायम बनाना ही राजनीति का अंतिम उद्देश्य

होना चाहिए।