17. महाड सत्याग्रह परिषद - दिसंबर 1927 महाड - Page 123

106 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

(3) सभी इन्सान सर्वाधिकार की मातृभूमि है। किसी भी व्यक्ति के, समुदाय के अगर

वर्ग के विशिष्ट अधिकार अगर जनता के द्वारा दिए हुए नहीं हों तो अन्य किसी

आधार पर, फिर भले वे राजनीतिक आधार हों या धार्मिक आधार हों, उन्हें

मान्यता नहीं दी जाएगी।

(4) किसी भी व्यक्ति को अपने जन्मसिद्ध अधिकारों के अनुसार आचरण करने की

पूरी स्वतंत्रता है। यदि उस व्यक्ति की आजादी पर रोक लगाने की आवश्यकता

का कारण यह होगा कि अन्य व्यक्ति को अपने जन्मसिद्ध अधिकारों का उपभोग

करने का अवसर प्राप्त हो, इस सीमित अर्थ में ही व्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक

लगाई जाएगी और यह व्यक्ति के अधिकारों पर रोक लगाने की सीमा कानून

के द्वारा तय की जाएगी। वह धर्मशास्त्रों के आधार पर तय नहीं की जाएगी।

(5) समाज के लिए हानिकारक बातें करने पर ही कानूनी पाबंदी लगाई जाएगी।

कानूनन जिन बातों पर प्रतिबंध न हो उन्हें करने की आजादी हर किसी को

समान रूप से हो। साथ ही, जो बातें करना कानूनन जरूरी न हों उन्हें करने

के लिए किसी को भी बाध्य न किया जाए।

(6) किसी वर्ग द्वारा तय किए गए बंधन यानी कानून नहीं। कानून कैसा होना चाहिए

यह तय करने का हक जनता के हर सदस्य को अथवा उसके प्रतिनिधि को होना

चाहिए। कानून सुरक्षात्मक हो या प्रशासनात्मक, वह सब पर समान रूप से लागू

हो। सबकी समानता के सिद्धांत पर ही किसी भी तरह का प्रबंधन खड़ा करना

न्यायपूर्ण होता है। सभी व्यक्तियों की योग्यता किसी भी प्रकार के मानसम्मान

के लिए, अधिकार के लिए, व्यवसाय के लिए एक समान होगी। हर व्यक्ति के

गुणों में जो फर्क होता है केवल उसी के आधार पर इस बारे में भेदाभेद किया

जा सकता है। लेकिन जन्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता।

आज की इस सभा के कारण फ्रांसिसी राष्ट्रीय सभा की प्रतिमा आपकी आंखों के सामने साकार होनी चाहिए, ऐसा मुझे लगता है। फ्रांसिसी राष्ट्रीय सभा ने फ्रांसिसी राष्ट्र के संवर्धन के लिए जो मार्गदर्शन तैयार किया तथा जिस मार्ग को सभी विकसित राष्ट्रों ने मान्यता दी वही मार्ग हिंदू समाज के संवर्धन के लिए इस सभा को अपनाना चाहिए, तथा बेटी-बंदी से लेकर मिलने-जुलने पर लगी पाबंदी तक के वर्णाश्रम धर्म के चोखटे की कील उखाड़ कर हिंदू समाज के वर्णों को एक बनाना चाहिए। उसके बगैर अस्पृश्यता नष्ट नहीं होगी और न समता प्रस्थापित होगी।

हममें से कुछ लोगों को हो सकता है लगे कि हम अस्पृश्य हैं, सो हम पर लादी गई लोटा-बंदी और मेल-मिलाप की पाबंदी हट जाए यही बहुत हुआ। वर्णव्यवस्था