17. महाड सत्याग्रह परिषद - दिसंबर 1927 महाड - Page 124

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से हमारा कुछ लेना-देना नहीं है। वह जैसे है उसी हालत में रहे, तब भी क्या फर्क पड़ता है? लेकिन मेरी राय में इस तरह की सोच गलत है। वर्णाश्रम को कायम रखते हुए अस्पृश्यता का उन्मूलन करने की नीति अपनाई तो अपना उद्देश्य एकदम हलका है, ऐसा लोग कहेंगे। मनुष्य मात्र के उद्धार के लिए जैसे बाह्य कोशिशों की जरूरत होती है, उसी प्रकार इच्छाओं की भी जरूरत होती है। इतना ही नहीं बल्कि इच्छाओं के बगैर इन्सान कोशिशें भी करेगा, इस बारे में मुझे शक है। इसलिए बड़ी कोशिशें करनी होंगी तो इच्छाएं भी बहुत बड़ी होनी चाहिए। इच्छाएं पालते समय इस बात की फिकर नहीं करनी चाहिए कि उन्हें पूरा भी किया जा सकता है या नहीं। इस बारे में मन में न डर और और न शर्म को प्रवेश करने दें। अगर शर्म पालनी ही हो तो इच्छाएं छोटी होने की पालें। अस्पृश्यता के जाने से आज हम जो अतिशूद्र हैं व शूद्र होंगे लेकिन अतिशूद्र से शूद्र होने में यह नहीं कहा जा सकता कि अस्पृश्यता का जड़समेत नाश हुआ है। अस्पृश्यता निवारण के लिए मिलने पर पाबंदी, लोटी-बंदी आदि तोड़ने जैसी छोटी इच्छाएं रख कर हमारा काम अगर होता तो मैं आपसे वर्णव्यवस्था को खत्म करने का आग्रह कतई नहीं करता। सद्गृहस्थों! आप जानते हैं कि सांप को मारना हो तो उसकी पूंछ पर मार कर नहीं चलता, उसका सिर कुचलना पड़ता है। किसी भी हानि करने वाले तत्व को निपटाना हो तो पहले उसकी जड़ को ढूंढ कर उसे उखाड़ना पड़ता है।

किसकी मौत किस में है यह ढूंढ कर ठीक उसी पर वार करना होता है। भीम ने दुर्योधन की जंघा पर गदा से प्रहार किया इसलिए दुर्योधन मरा। वह उसके सिर पर वार करता तो दुर्योधन नहीं मरता। क्योंकि दुर्योधन की मौत उसकी जंघा में थी। सिर में नहीं थी। शरीर के रोग की मृत्यु किस में है, इस बात का पता न चलने के कारण वैद्य द्वारा किए गए इलाज किस तरह बेअसर होते हैं इसके कई उदाहरण हम देखते हैं। उसी प्रकार सामाजिक रोग का सही इलाज क्या है, इसका पता न चलने से उसका परिहार करने के लिए की गई सारी कोशिशें बेकार चली जाने के उदाहरण इतिहास में लिखे न जाने के कारण हमें देखने को नहीं मिलते हैं। हालांकि इस तरह का एक उदाहरण मेरे ध्यान में आया है जिसे मैं आपको बता रहा हूं। यूरोप के प्राचीन राष्ट्र रोमन में पेट्रीशियन और प्लेबियन नाम के दो वर्ग थे। इनमें से पेट्रीशियन उच्चकुलीन थे और प्लेबियन निम्न वर्ग के थे। पेट्रीशियन वर्ग के हाथ में पूरी सŸा थी। इस सŸा के बल पर वे प्लेबियन लोगों के साथ बहुत बुरा बर्ताव करते थे। इस परेशानी से मुक्त होने के लिए उन्होंने एकता के बल पर आग्रह किया कि मनमानी का कानून रद्द कर सबकी जानकारी के लिए और न्यायदान की सहूलियत के लिए कानून लिखित स्वरूप में हो, उसे लिखा जाए। प्लेबियन प्रतिपक्ष के पेट्रीशियन लोग इस बात के लिए राजी हुए। बारह