108 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
(12) कानूनों की एक तख्ती लिखी गई। लेकिन इतना कार्य करने भर से प्लेबियन लोगों की परेशानियां खत्म नहीं हुईं। क्योंकि उन कानूनों पर अमल करवाने वाले सभी अधिकारी पेट्रीशियन वर्ग के थे। यही नहीं तो रोमन राष्ट्र का मुख्य अधिकारी जिसे ट्रायब्यून कहा जाता था, वह भी पेट्रीशियन ही था। इसीलिए, कानून एक ही होने के बावजूद उस पर अमल करते हुए पक्षपात होता ही रहता था। सो आखिरी उपाय के तहत उन्होंने पेट्रीशियन लोगों के सामने मांग रखी कि रोमन राष्ट्र का कामकाज एक ट्रिब्यून के हाथ में रहने की जगह दो के हाथ में हो। इनमें से एक ट्रिब्यून का चुनाव पेट्रीशियन लोग करें और दूसरे का चुनाव प्लेबियन लोग करें। उनकी यह मांग भी पेट्रीशियन लोगों ने स्वीकार कर ली। प्लेबियन लोगों को लगा कि अपने सभी क्लेशों का निवारण हुआ ही है। वे खुश हुए। लेकिन उनकी खुशी ज्यादा दिनों तक टिकी नहीं। रोमन लोगों में ऐसी रीत (परंपरा) थी कि ग्रामदेवता डेल्फी की मर्जी के बगैर कोई बात नहीं करनी है। इसीलिए ट्रिब्यून अगर चुना भी गया तो भी अगर वह डेल्फी को पसंद नहीं आया तो उस चुनाव को रद्द कर दुबारा चुनाव करना पड़ता था। देवता को सगुन लगाने का काम जिस पुरोहित के जिम्मे होता था, उसके चुनाव के बारे में रोमन समाज में एक संकेत हुआ करता था। रोमन समाज में शादी करने के कई तरीके थे। उनके शास्त्रों के अनुसार, उनमें से कनफेराशिओ तरीके से जिनका विवाह हुआ हो ऐसे माता-पिता से जिसका जन्म हुआ हो, केवल वही डेल्फी का पुरोहित बन सकता है। कानफेराशियो तरीके से शादी करने की रीत सिर्फ पेट्रीशियन लोगों में ही थी। इसीलिए डेल्फी का पुरोहित पेट्रीशियन वर्ग का ही हुआ करता था। इस पुरोहित की कार्रवाई से अंत में हुआ यह कि अगर प्लेबियन लोग अपने किसी कट्टर पुरुष को अपनी ट्रिब्यून के रूप में चुनते तो देवता डेल्फी सगुन नहीं देती थी। ट्रिब्यून के लिए प्लेबियन लोगों द्वारा चुना गया पुरुष अगर पेट्रीशियन लोगों के हितों की रक्षा करने वाला या दब्बू हो तभी देवी उसके नाम से सगुन देती और उसे अधिकार पाने का मौका मिलता। ऐसे में सोचिए कि, ट्रिब्यून चुनने का अधिकार पाकर भी प्लेबियन लोगों को आखिर क्या मिला? कहना पडे़गा कि, कुछ भी नहीं। उनकी कोशिशें नाकाम रहीं, इसलिए कि समस्या की जड़ क्या है, यह खोजने की उन्होंने कोशिश नहीं की। इस बात का अगर उन्हें पता होता तो अपने ट्रिब्यून की मांग करते समय ही वे इस सवाल को भी हल कर लेते कि पुरोहित कौन होगा। समस्या का हल सिर्फ ट्रिब्यून मांगने में नहीं था। यह वे समझ नहीं पाए कि समस्या का हल असल में पौरोहित्य छीनने में था। हमें भी अस्पृश्यता को खत्म करने का उपाय ढूंढते हुए इस रोग की जड़ किस में है, इसका पता करना चाहिए। वरना हमारे साथ भी वही सब होने का डर है। हम भी निशाना चूक जाएंगे।