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मेल-मिलाप की पाबंदियां हटीं या लोटा-बंदी हटी तो अस्पृश्यता खत्म हुई ऐसा समझने की गलती कŸाई नहीं करें। इस मामले में एक बात को अवश्य ध्यान में रखें। वह यह कि लोटा-बंदी और मिलने-जुलने पर लगी पाबंदी अगर हट गई तो अस्पृश्यता ही खत्म हुई ऐसी बात नहीं है। इनसे बहुत हुआ तो घर के बाहर की अस्पृश्यता खत्म होगी लेकिन घर के अंदर की अस्पृश्यता बरकरार रहेगी। दरवाजे से बाहर की अस्पृश्यता के साथ दरवाजे के अंदर की अस्पृश्यता को अगर आप हटाना चाहते हैं तो बेटी-बंदी हटानी होगी। उसके अलावा इस समस्या का कोई और उपाय नहीं है। अन्य नजरिए से देखें तब भी बेटी-बंदी को हटाना ही समता प्रस्थापित करने का सही मार्ग है। मुख्य भेद खत्म होते ही अन्य सभी भेद अपने आप खत्म होते हैं, यह सब जानते हैं। छोटे भेदभाव के खत्म होने से मुख्य भेद खत्म हो ही जाएगा इसका कोई भरोसा नहीं। बेटी-बंदी की एक बंदी से अन्य सभी - रोटी-बंदी, लोटी-बंदी और मेल-मिलाप की पाबंदियां अपने आप खत्म हो जाएंगी। बेटी बंदी को हटाने से अन्य सभी बंदियां अपने आप हट जाएंगी, कोशिश ही नहीं करनी पडे़गी। मेरी राय में बेटी बंदी का बांध तोड़ना ही, ध्वस्त करना ही अस्पृश्यता निवारण का सही मार्ग है। उसीसे सही मायने में समता स्थापित होगी। हमें अस्पृश्यता को अगर नष्ट करना है तो हमें यह पहचानना चाहिए कि अस्पृश्यता की जड़ बेटी-बंदी में है। हमारा आज का हमला भले लोटी-बंदी पर हो लेकिन आखिर हमें बेटी-बंदी पर ही हमें अपने हमले का रुख करना होगा। उसके बगैर अस्पृश्यता जड़ समेत नष्ट नहीं होगी।
यह काम कौन पूरा कर सकता है? ब्राह्मणवर्ग इसे पूरा नहीं कर सकता, यह अलग से बताने की जरूरत नहीं है। जब तक वर्णव्यवस्था है तब तक ब्राह्मणों की श्रेष्ठता बनी हुई है। कोई भी अपने श्रेष्ठत्व के अधिकार छोड़ना नहीं चाहता। अपनी मर्जी से हाथ आई सŸा कोई नहीं त्याग सकता। कई शतकों से ब्राह्मण वर्ग ने अन्य वर्गों पर अपना सार्वभौमत्व बनाए रखा है। उसे छोड़ कर अन्य लोगों की तरह ही उनकी बराबरी का व्यक्ति बन कर जीने के लिए वे तैयार होंगे यह संभव नहीं हो सकता। जापान का सामुराई वर्ग राष्ट्र प्रेमी है, किन्तु ब्राह्मणों में राष्ट्रप्रेम नहीं है। इसीलिए सामुराई वर्ग ने अपने विशिष्ट सामाजिक अधिकार त्याग कर राष्ट्रैक्य पाने के लिए समता की नीव पर राष्ट्र में एकता की स्थापना करने के लिए जो स्वार्थ त्याग किया ऐसा हमारे ब्राह्मण वर्ग से होगा ऐसी उम्मीद रखना भी बेकार है। गैर-ब्राह्मण वर्ग से भी लगता नहीं कि यह जिम्मेदारी निभाई जाएगी। गैर-ब्राह्मण यानी मराठा और उसके समान जातियों वाला वर्ग असल में अधिकारसंपन्न और अनधिकारी इन दो वर्गों के बीच वाला वर्ग है। अधिकार संपन्न वर्ग को थोड़ा स्वार्थ त्याग कर अपनी उदारता दिखाना संभव होता है। जो अनधिकारी वर्ग हमेशा ध्येयवादी होता है क्योंकि स्वार्थ के लिए ही सही उसे समाज