17. महाड सत्याग्रह परिषद - दिसंबर 1927 महाड - Page 127

110 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

में क्रांति लानी होती है। और इसीलिए स्वार्थप्रियता से अधिक सिद्धांतप्रियता उसके रग-रग में बसी होती है। गैर-ब्राह्मण वर्ग इन दोनों के बीच का वर्ग होने के कारण इनमें से एक के पास होने वाली उदारता उसके पास नहीं होती और दूसरे को प्राप्त सिद्धांतप्रियता उसके अंदर नहीं पनप सकती और इसलिए ब्राह्मणों के समान अधिकार पाने से अधिक यह वर्ग अस्पृश्यों से अपने विशिष्ट अधिकारों को सुरक्षित रखने के प्रति ज्यादा जागरुक होता है। सामाजिक क्रांति के इस काम में वह समाज अपाहिज है। उनसे मदद पाने की उम्मीद लगा कर अगर हम बैठें तो हमारी हालत भी कहानी में बताए जाने वाले उस किसान की तरह होगी जो अपनी फसलों की कटाई के लिए औरों पर निर्भर करता रहता है। उसके खेत में बने घोंसले में पंछी अपने बच्चों से कहती है कि जब तक किसान अपने पड़ोसियों पर निर्भर हैं, तब तक हमारे लिए यहां कोई खतरा नहीं है। अस्पृश्यता का निवारण कर समता की स्थापना करने का जो बीड़ा हमने उठाया है, उस जिम्मेदारी को हमें खुद के भरोसे ही पूरा करना है। अपने अलावा किसी और के हाथों यह काम नहीं हो पाएगा। अपना जीवन इसी कार्य के लिए है, यही मान कर काम शुरू करने में ही जीवन की सार्थकता है। यह पुण्य कार्य हमारे हिस्से आ रहा है, तो हम पूरे सम्मान के साथ उसको स्वीकार करेंगे।

यह कार्य आत्मोद्धार का है, इसलिए अपनी उन्नति की राह की अडचनें दूर करने के लिए उसे स्वीकार करना ही होगा। अस्पृश्यता के कारण हमारी मिट्टी कैसे पलीत की गई है, यह आप सब लोग जानते हैं। आप जानते हैं किसी जमाने में हम लोगों की सेना में बडी संख्या में भर्ती हुआ करती थी। सेना की नौकरी हमारे लिए वतनदारी के समान थी। उसी वतनदारी के कारण हम में से किसी को पेट की चिंता नहीं करनी पड़ती थी। हमारे साथ वाले अन्य वर्ग के लोग सेना में, पुलिस में, कोर्ट-कचहरी में नौकरी पाकर खुशी खुशी अपना पेट पाल रहे हैं। लेकिन उन्हीं विभागों में हम में से कोई भी आदमी आज नहीं मिलता। इसकी वजह यह नहीं कि इन विभागों में नौकरी पाने से कानूनन हम पर पाबंदी लगाई गई है। कानूनन सभी राहें खुली हैं। लेकिन अन्य हिंदू लोग हमें अस्पृश्य मानते हैं, नीचा और हीन समझते हैं। इसलिए सरकार ने भी घुटने टेक दिए हैं। वे सरकारी नौकरियों में हमारा प्रवेश नहीं होने देते। इसी तरह हम सम्मान के साथ कोई व्यवसाय भी नहीं कर सकते। पैसा नहीं होने की वजह से हम व्यवसाय नहीं कर सकते, यह कुछ हद तक ठीक है लेकिन हमारी अस्पृश्यता के कारण हमारे हाथ का छुआ माल कोई नहीं लेगा यही हमारे व्यवसाय करने के राह की सबसे बडी मुश्किल है। कुल मिला कर कह सकते हैं कि अस्पृश्यता सीधी-सादी बात नहीं है। यह हमारी दरिद्रता और हीनता की जननी है। उसी के कारण आज हमारा ऐसा बुरा हाल हुआ है। इस हीन स्थिति से अगर हमें उबरना है तो हमें यह कार्य हाथ में लेना ही होगा। उसके अलावा हमारे सामने कोई चारा ही नहीं है।