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यह काम जैसे स्वहित का है उसी तरह राष्ट्रहित का भी है। चातुर्वर्ण्य के तहत अस्पृश्यता जब तक नष्ट नहीं होती तब तक हिंदू समाज के आगे कोई और चारा नहीं है। जीवन कलह से उबरने का एक उपाय इस हिसाब से किसी भी समाज को जिस साधन-सामग्री की अवश्य जरूरत होती है उस साधन-सामग्री में सामाजिक नीतिमŸा का बहुत बड़ा स्थान है। जिस समाज की नीतिमŸा समाज को एकजुट करने वाली होगी उसी को स्तुत्य माना जाता है। जिस समाज में समाज को एकजुट करने वाले कारणों को निषिद्ध माना जाता है उसे जीवन कलह में हार
खानी पड़ती है। उल्टे जिस समाज की नितिमŸा इस प्रकार की है जिन कारणों से समाज में फूट पड़ती है उन कारणों को निंदनीय माना जाता है, उस समाज को जीवन कलह में सफलता मिले बगैर नहीं रहती। यही न्याय हिंदू समाज पर भी लागू करना पड़ता है। चातुर्वर्ण्य व्यवस्था लोकविग्रहकारी व्यवस्था है और एकवर्णी व्यवस्था लोकसंग्रहकारी है। खुली आंखों से जब यह बात दिखाई देती है, जिससे विग्रह होता ऐसी व्यवस्था की जय बोलने वाले हिंदू समाज को बार-बार हार का मुख देखना पड़ा हो तो उसमें आश्चर्य की ऐसी कौन सी बात है? लोगों के जो बुरे हालात हो रहे हैं, उससे अगर छुटकारा पाना हो तो चातुर्वर्ण्य का चौखटा तोड़ कर उसे एक वर्ण होना पड़ेगा। इतने भर से काम नहीं चलेगा। साथ ही चातुर्वर्ण्य के अंतर्गत होने वाली असमानता को भी नष्ट किया जाना चाहिए। कई लोग समता के तत्व का मजाक उड़ाते हैं। प्राकृतिक रूप से कोई भी मनुष्य दूसरे मनुष्य जैसा नहीं होता। किसी का शरीर भव्य होता है, तो किसी का शरीर बिल्कुल ठिंगना, दुबला-पतला होता है, कोई जन्म से ही श्रेष्ठबुद्धि होता है तो कोई मंद या कुंद बुद्धि होता है। जब इंसान पैदाइशी असमान होते हैं, तो समतावादियों का कहना लोगों को पागलपन लगता है कि सब लोग एक समान होते हैं। खिल्ली उड़ाने वाले इन लोगों को समता का अर्थ पूरी तरह समझ नहीं आया है यही कहना पडे़गा। वे पूछते हैं कि अधिकार प्राप्ति किसी के जन्म के आधार पर, संपिŸा के आधार पर या अन्य किसी बात पर निर्भर न मानते हुए समता के सिद्धांत के अनुसार उसे केवल गुणों पर आधारित माना जाए तो जो गुणहीन है, गंदा (मलिन) है, बुरा बर्ताव करता है ऐसे व्यक्ति के साथ गुणवान, अच्छे बर्ताव वाला व्यक्ति समानता से पेश आए, ऐसी मांग कैसे की जा सकती है? ऐसा प्रति-प्रश्न पूछा जा सकता है। व्यक्तियों के साथ समानता से पेश आने वाली समता की परिभाषा का अधिकार बहाल करते हुए लागू करना ठीक है। लेकिन व्यक्ति के अंतर्भूत गुणों का विकास होकर उसके अधिकार के लिए लायक बनने से पूर्व ही सबके साथ फिर चाहे उनमें कितनी भी असमानता क्यों न हो एक-सा बर्ताव करना ही न्यायपूर्ण होगा। समाजशास्त्र के अनुसार व्यक्ति के अंदर जो गुण होते हैं, उनके विकास के लिए सामाजिक व्यवस्था ही कारण होती है। गुलामों के साथ हमेशा असमान बर्ताव किया जाता है, सो उनके अंदर दासत्व