17. महाड सत्याग्रह परिषद - दिसंबर 1927 महाड - Page 129

112 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

से अलग किन्हीं गुणों का उद्भव होगा ही नहीं। वे किसी अन्य अधिकार को पाने के योग्य नहीं बनेंगे। उसी प्रकार अस्वच्छ गंदे-मलिन इन्सान को स्वच्छ साफ-सुथरे आदमी द्वारा गंदे आदमी को न छूने से, उसे दुत्कारने से, उसका बहिष्कार, उस आदमी को अपने से दूर करने पर उसके साथ होने वाला हर व्यवहार बंद करने से बुरी प्रवृŸा वाले इंसानों के मन में कभी अच्छे तरीके से जीने की इच्छा ही पैदा नहीं होगी। गुनहगार या अनैतिक जातियों को अगर नैतिकतापूर्ण जातियां प्रश्रय नहीं देंगी अनीतिपूर्ण जातियों को नीतिपाठ भला कहां से पढ़ने मिलेगा। इस बारे में जो उदाहरण दिए हैं उनसे यह सिद्ध होता है कि जिसके अंदर समता के गुण नहीं होते, वहां उन गुणों को उत्पन्न करने् के लिए वे भले कारण न बनें लेकिन यह बात सच है कि समानता के बर्ताव के बगैर सुप्त गुणों का विकास कभी नहीं होगा। यह बात जितनी सत्य है उतनी ही यह बात भी सत्य है कि समानता के बर्ताव के बगैर हममें होने वाले गुणों की कदर भी नहीं होती। एक हाथ से हिंदू समाज के असमान व्यक्तियों का विकास अवरुद्ध कर समाज को बौना बनाते हैं और दूसरे हाथ से यही असमानता व्यक्ति की शक्तियों का सही उपयोग करने देने से समाज को रोकता है। चातुर्वर्ण्य के कारण दोनों ओर से अस्त-व्यस्त हुए हिंदू समाज को यह असमानता और अधिक दुर्बल बना रही है। इसीलिए कहता हूं कि अगर हिंदू समाज को स्वावलम्बी, समर्थ बनाना है तो चातुर्वर्ण्य और असमानता को नष्ट कर हिंदू समाज की रचना एकवर्णत्व और समता इन दो तत्वों की नींव पर रखनी ही चाहिए। अस्पृश्यता निवारण का मार्ग हिंदू समाज को सुदृढ़ बनाने वाले मार्ग से भिन्न नहीं। इसीलिए मेरा कहना है कि हमारा कार्य जितना स्वहित का है उतना ही राष्ट्रहित का भी है इसमें कोई शक नहीं।

सही मायनों में समाज में क्रांति लाने के लिए यह कार्य शुरू किया गया है। केवल मीठे शब्दों के मधुर स्वरों से मोह में पड़े मन को समझाने के लिए बस यह सब किया जा रहा है, ऐसा कोई भी ना समझे। इस कार्य को भावना का सहारा है और वह भावना इस कार्य को आगे बढ़ाने वाली शक्ति है। इसलिए इस कार्य की गति को रोकना अब किसी के लिए संभव नहीं। यह सामाजिक क्रांति शांतिपूर्ण तरीके से पूरी हो ऐसी मैं इस जगह जग के नियंता से प्रार्थना करता हूं। और यह समाज क्रांति शांतिपूर्ण ढंग से संपूर्ण हो इसकी जिम्मेदारी हमसे अधिक हमारे प्रतिपक्ष पर अधिक है इस बारे में किसी को शक नहीं हो सकता। समाज में आने वाली यह क्रांति अत्याचारी होगी या अनत्याचारी, यह पूरी तरह स्पृश्य लोगों के बर्ताव पर निर्भर करता है 1789 की फ्रांसिसी राष्ट्रीय सभा को अत्याचार करने के लिए जो लोग दोषी ठहराते हैं, वे एक बात भूलते हैं कि फ्रांसिसी राष्ट्रीय सभा के साथ फ्रांस देश के राजा ने अगर छलकपट भरा व्यवहार नहीं किया होता तो और