17. महाड सत्याग्रह परिषद - दिसंबर 1927 महाड - Page 130

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वरिष्ठ प्रजा ने यदि विरोध नहीं किया होता, और ना ही परायों की मदद लेकर उसे दबाने की कोशिश का पाप नहीं किया होता तो इसे क्रांति की राह में अत्याचार नहीं करने पड़ते। समाज की वह क्रांत शांतिपूर्ण ढंग से पूरी होती। हमारे प्रतिपक्ष से भी हमारा यही कहना होता है कि आप हमारा विरोध ना करें। पराए सरकार या पराए धर्म की मदद लेकर इस पर हमला, इसे कुचलने का प्रयास मत कीजिए। शास्त्रों से पल्ला झाड़ लीजिए, न्याय के अनुसार चलें, हम आपको यकीन दिलाते हैं कि हम यह कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से ही पूरा करेंगे।

डॉक्टरसाहेब का भाषण पूरा होने के बाद जो प्रस्ताव पारित किया गया, उसका मसौदा इस प्रकार था -

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पहला प्रस्ताव :

इस सभा की यह पक्की राय है कि समकालीन हिंदु समाज इस बात का पक्क सबूत है कि सामाजिक अन्याय, धार्मिक ग्लानि, राजनीतिक अवनति और आर्थिक गुलामी के कारण राष्ट्र की कैसे अवनति होती है। बहुजन समाज ने यह जानने की तत्परता कभी नहीं दिखाई कि मनुष्यमात्र के जन्मसिद्ध अधिकार क्या हैं? और मनुष्यमात्र के इन जन्म सिद्ध अधिकारों को अक्षुण्ण रखने की जिम्मेदारी भी कर्त्तव्य निष्ठता से निभाई नहीं तथा स्वार्थ-लालच में लिप्त लोगों के षड्यंत्रकारी कारनामों का भंडाफोड़ कर, उन पर अंकुश लगाया नहीं, उनकी करतूतों की रोकथाम की नहीं, और यही हिंदु समाज की ऐसी घोर दशा होने का कारण बना। अधिकार क्या हैं? संकट के समय उनकी रक्षा कैसे की जा सकती है? आपसी व्यवहार में इस बात का खयाल कैसे रखें कि कोई हमें न कुचल दें? हिंदुओं के जन्मसिद्ध अधिकार क्या हैं, यह जानकारी हिंदुओं के हमेशा सामने रही, इसलिए दुनिया के रक्षक सर्व साक्षी परमेश्वर को गवाह रखते हुए और उसका आशिर्वाद मांगते हुए निम्नलिखित घोषणा-पत्र आज की सभा की ओर से सबकी जानकारी के लिए प्रकाशित कर रहे हैं -

(i) सभी इंसान पैदाइश से समान ही होते हैं और मरने तक वे समान दरजे

के ही रहेंगे। उपयोगिता के नजरिए से ही लोगों में फर्क किया जा सकता

है। बाकी समय उनका दर्जा समान होना चाहिए। इसीलिए राज्य के कामों

में और सार्वजनिक व्यवहारों में इस सभा की राय में समानता के सिद्धांत

पर आँच आने वाली किसी नीति और विचारों को बढ़ावा न दिया जाए।

(ii) राज्य की व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य यही होना

चाहिए कि ये उपरोक्त जन्मसिद्ध मानवी अधिकार कायम रहें। इसलिए

हिंदु समाज की विषमतामूलक रचना का और वैसी रचना को स्वीकार