17. महाड सत्याग्रह परिषद - दिसंबर 1927 महाड - Page 131

114 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

करने वाले प्राचीन और आधुनिक ग्रंथों के वचनों के प्रति इस सभा की

ओर से तीव्र निषेध व्यक्त किया जाता है।

(iii) सम्पूर्ण जनता ही सभी अधिकारों और सŸा का उद्गम स्थान है। किसी

व्यक्ति का, समुदाय का, या वर्ग का विशिष्ट अधिकार, यदि बहुजन समाज

की ओर से वे न दिए गए हों तो अन्य किसी भी आधार पर मान्यता प्राप्त

करने के लिए योग्य नहीं हों सकते, भले वे आधार राजनीतिक हों या

धार्मिक हों। इसीलिए समाज की व्यवस्था के बारे में श्रुति, स्मृति, पुराण

आदि ग्रंथों के प्रति यह सभा तीव्र निषेध व्यक्त करती है।

(iv) हर व्यक्ति अपने जन्मसिद्ध अधिकारों के अनुसार बर्ताव करने के लिए

स्वतंत्र है। उस पर अगर सीमा तय की जाए, तो वह इतनी ही डाली जा

सकती है कि वह दूसरे व्यक्ति के लिए उसका उसी प्रकार के जन्मसिद्ध

अधिकार का उपभोग करने का उसे अवसर मिले। यह सीमा लोगों

द्वारा तैयार किए गए कानूनों से तय की जाए। धर्मशास्त्र या अन्य किसी

भी आधार से उसे तय नहीं किया जाए। उसके लिए अष्टाधिकार जैसे

मामलों की तरह, विभिन्न जातियों में तय की गई असमान व्यवस्था का

यह सभा धिक्कार करती है।

(v) समाज के लिए घातक होने वाली बातों पर ही कानूनन पाबंदी लगाई

जाए। कानून में जिस बात पर पाबंदी नहीं लगाई गई हो, उसे करने की

आजादी हर किसी को हो। उसी प्रकार कानूनन जो बातें करना आवश्यक

नहीं माना गया है, उन बातों को करने पर किसी को विवश नहीं किया

जा सकता। इसीलिए सड़कों का, सार्वजनिक पनघटों का और मंदिरों

आदि का, सभी लोगों द्वारा प्रयोग करने पर पाबंदी न लगाई जाए। इसके

लिए यह सभा समझती है कि इस तरह की पाबंदियां लगाने वाले लोग

सुव्यवस्थित समाज रचना के और न्याय के दुश्मन हैं।

(vi) कानून यानी किसी एक वर्ग द्वारा तय किए गए बंधन नहीं। वह किस

प्रकार का हो, यह तय करने का अधिकार सारी जनता को अथवा उसके

प्रतिनिधि को होना चाहिए। कानून सुरक्षा संबंधी हो या प्रशासनिक वह

सब पर एक-सा लागू हो। समता की नींव पर समाज रचना करनी होती

है। इसलिए मानसमान, अधिकार और व्यवसाय आदि के बारे में जाति का

अडंगा बीच में नहीं आना चाहिए। भेदाभेद केवल व्यक्ति के गुणभेदों के

कारण ही हों, उसके जन्म के कारण न हों। इसके लिए प्रचलित जातिभेद