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पद्धतियों का और उनके साथ आने वाली विषमताओं तथा विभाजन के
प्रति यह सभा तीव्र निषेध व्यक्त करती है।
प्रस्ताव प्रस्तुत कर्ता - डॉ. सीताराम नामदेव शिवतरकर
समर्थन किया - रा. भाऊ कृष्णा गायकवाड़
पुष्टि की - रा. एन. टी. जाधव
अनुमोदन दिया - श्रीमती गंगाबाई सावंत दूसरा प्रस्ताव :
शूद्र जातियों की अवमानना करने वाली, उनके विकास को रोकने वाली, उनके आत्मबल को नष्ट कर उनकी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक गुलामी कायम करने वाली, बातों को नुकसानदेह जान कर, उन छल-कपट भरे हथकण्डों को मनुस्मृति में आगे दिए जा रहे हैं, विभाजन कभी ध्यान में रखते हुए तथा उन पर हिंदु मात्र के जन्मसिद्ध हकों के घोषणा-पत्र में सम्मिलित किए गए तत्वों के साथ तुलना करते हुए यह ग्रंथ धर्मग्रंथ इस पवित्र नामकरण के लिए अयोग्य हैं, इस राय को व्यक्त करने हेतु, लोगों के बीच फूट डालने वाले और इंसानियत का कत्ल करने वाले धर्मग्रंथ का यह सभा दहन विधि कर रही है।
प्रस्ताव के प्रस्तुत कर्ता - श्री गंगाधर नीलकंठ सहस्त्रबुद्धे
समर्थन किया - रा. राजभोज
पुष्टि की - रा. थोरात
(सूचना- इस प्रस्ताव में जो वचन कहे गए उन्हें अगले अंक में प्रकाशित किया जाएगा। - सम्पादक, ”बहिष्कृत भारत“) तीसरा प्रस्ताव
हिंदू धर्म के सभी लोगों को एकवर्णीय माना जाए। हिंदू के नाम से इस वर्ग को संबोधित किया जाए और पहचाना जाए। परिषद के मतानुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि वर्गों के नामों से या महार, मांग आदि जाति पर आधारित संज्ञाओं से
खुद को अथवा औरों को संबंधित करने पर कानूनन पाबंदी लगाई जाए। जरूरत हो तो व्यवसाय पर आधारित शिंपी (दर्जी), सोनार (सुनार), माली आदि कहलाना और मराठा, कोकणस्थ (कोकण के रहने वाले), देशस्थ (देश के रहने वाले) आदि प्रांत निर्देशक अथवा देश निर्देशक नाम उपयोग में लाने में कोई ऐतराज नहीं।
”बहिष्कृत भारत“ उक्त अंक उपलब्ध नहीं हो पाया।