17. महाड सत्याग्रह परिषद - दिसंबर 1927 महाड - Page 134

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फीट लंबाई वाले चार खंबे खडे़ किए गए थे। तीन तरफ से पताकाएं लगाई गई थीं, जिन पर ”मनुस्मृति की दहनभूमि“, ”अस्पृश्यता नष्ट करो“, ”पुरोहितवाद को दफना दो“ आदि नारे लिखे गए थे। दिनांक 25 दिसंबर, 1927 को रात नौ बजे बापूसाहब सहस्त्रबुद्धे तथा अन्य पांच-छह अस्पृष्य साधुओं के हाथों इस दहनभूमि पर ‘मनुस्मृति’ की किताब रख कर, उसे जलाया गया। ख्2,

इसके बाद पहले दिन का कामकाज खत्म हुआ।

दूसरा दिन

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पहले दिन की सभा की कार्रवाई रात साढ़े सात बजे खत्म होने के बाद लोग आतुरता से भोजन का इंतजार कर रहे थे। जिले-जिले से आए लोग सत्याग्रह समिति की सूचनाओं के अनुसार अपने साथ रोटियां लाए थे। लेकिन चूंकि ये लोग सम्मेलन के शुरू होने से दो दिन पहले आए थे, इसलिए उनकी रोटियां खत्म हो गईं थीं। मुंबई से आए लोगों को पूरे दिनभर खाली पेट रहना पड़ा था और वे इतजार कर रहे थे कि भोजन कब मिलेगा। लेकिन मुंबई से खाना बनाने के बर्तन महाड न पहुंंचने के कारण सामग्री होने के बावजूद खाना नहीं बनाया जा सका, इसलिए सबको निराशा हुई। सत्याग्रह समिति को अंदाजा था कि ऐसी स्थिति आ सकती है। इसलिए उन्होंने चावल दाल के साथ भुने हुए चने भी खरीदे थे। उस रात सबको खाने के बदले चने दिए गए और लोगों को उसी पर गुजारा करना पड़ा। ऐसा लगा कि कई लोगों को चना खाकर रहना रास नहीं आया। लेकिन जब डॉ. अम्बेडकर ने अपने हिस्से के चने लेकर खाना शुरू किया, तभी लोगों ने उनका अनुकरण किया।

26 दिसम्बर, 1927 को यानी दूसरे दिन सुबह नौ बजे परिषद के कामकाज की शुरुआत हुई। उस दिन सत्याग्रह के बारे में बातचीत करनी थी। सो परिषद में या सम्मेलन में विषय नियामक कमेटी का गठन किया गया। उसके अनुसार डॉ. अम्बेडकर ने सभा के आसपास खडे़ किए स्वयंसेवकों को हिदायत दी थी कि कोई भी अजनबी आदमी अंदर न आने पाए। उसके बाद सत्याग्रह किया जाए, इस आशय का प्रस्ताव डॉ. अम्बेडकर ने सभा के सामने पेश किया। प्रस्ताव पेश करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा, कि कल कलक्टर साहब ने मुझे मुलाकात करने के लिए बुलाया था। उसमें उन्होंने मुझसे यह कहा कि वे इस सत्याग्रह के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन स्पृश्य लोगों ने इस बारे में दीवानी अदालत में फरियाद की है और उसका निपटारा होने तक अस्पृश्य लोग चवदार तालाब पर ना जाएं। इस तरह का तात्कालिक स्थगनादेश वे ले आए हैं। कोर्ट की अवमानना न हो इसलिए मुझे इस

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकर चरित्र : चांगदेव भवानराव खैरमोडे़, खंड 3, पृ. 194