17. महाड सत्याग्रह परिषद - दिसंबर 1927 महाड - Page 137

120 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के वक्ताओं की भी बात सुन लीजिए। पक्ष-विपक्ष के लोगों के भाषण खत्म हुए तो डॉ. अम्बेडकर ने कहा-

”कुल मिला कर सभा की राय सत्याग्रह के लिए अनुकूल है, ऐसा ही कहना पड़ेगा। मुझे इस बारे में खुशी है, लेकिन मेरे पीछे अंधों की सेना नहीं चाहिए। मैं कह रहा हूं इसलिए या कोई और कह रहा है, इसलिए जेल जाकर फंस जाने वाले लोग मैं नहीं चाहता। जेल जाऊंगा लेकिन मैं अपनी अस्पृश्यता से पीछा छुडाऊंगा, कहने वाले लोग मुझे चाहिएं। सत्याग्रह करना है अथवा नहीं यह निश्चित करने से पहले इस प्रकार आत्मयज्ञ करने के लिए कितने लोग तैयार हैं? यह तय करना जरूरी है। यह ऐसी बात नहीं है कि तालियों की गड़गड़ाहट से अथवा हाथ ऊपर उठा कर तय की जा सके। वह गिनती के आधार से ही तय की जानी चाहिए। इसीलिए जो लोग सत्याग्रह करने के लिए तैयार हैं ऐसे लोगों की गिनती करने के लिए मैं कहने वाला हूं। उस गिनती के आधार से अगर लगे कि बहुमत सत्याग्रह के लिए अनुकूल है, तो ही मैं कलक्टर साहब को सूचना दूंगा। और शाम के समय आकर आप लोगों के सामने भाषण करने का निमंत्रण दूंगा। उनकी बात सुनने के बाद भी अगर आपकी राय पक्की रही तभी हम सत्याग्रह करेंगे। अब साढ़े बारह बजे हैं और भोजनावकाश के लिए सभा स्थगित की जा रही है।“

वे सभा समाप्ति की घोषणा करने ही जा रहे थे कि मुंबई के गैर-ब्राह्मणों के पक्ष की ओर से केशवराव जेधे और श्री दिनकरराव जवलकर मुंबई से स्पेशल मोटर से आए। सभामंडप में वे दाखिल हुए। अध्यक्ष द्वारा उन्हें बोलने के लिए आमंत्रित किया गया। श्री जवलकर ने अपने भाषण में कहा, आप यहां धर्म की लड़ाई लड़ने के लिए आए हैं, यह ठीक है। दुर्भाग्य से कुछ मराठा लोग आपका विरोध कर रहे हैं। मैं मराठा हूं इसलिए मुझे इस बात से बेहद शर्म महसूस होती है। आज तक हम मराठों ने और ब्राह्मणों ने आपको जो तकलीफ दी उसके लिए मैं बस यही कह सकता हूं कि हम पातकी हैं। हमने आप लोगों के हाथ में ये सफाई के साधन थमाए हैं। उनका आपको त्याग करना होगा। जहां हमारी मालकियत है, वहां आपकी भी है। आपके नेता बैरिस्टर अम्बेडकर द्वारा चलाया गया यह आंदोलन आपके योग्य अधिकारों की प्रस्थापना के लिए है। मैं दो बार जेल गया। जेल से घबराने की कोई जरूरत नहीं है। अंग्रेज सरकार के जेल में कोई जातिभेद नहीं है। बाहर के भेद भरे इस नर्क में जीने से जेल बेहतर है। मैं और श्री जेधे ‘सत्यशोधक समाज’ की ओर से सहानुभूति दर्शाने के लिए आए हैं। मराठा लोग महारों से ज्यादा काम करवाते हैं। उनके शरीर से बहता पसीना देख कर भी कुलकर्णियों का दिल नहीं पसीजता। ईश्वर अगले जनम में मराठों को अस्पृश्य बनाए। डॉ. अम्बेडकर जैसा ज्ञानी और समर्थ आदमी अस्पृश्यों में कोई दूसरा नहीं है। वे आपके हित के लिए कोशिशें कर