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कलक्टर साहब की भी यही राय है। मेरा आपसे अनुरोध है कि आप गैर-ब्राह्मण पार्टी और जिलाधिकारी (कलेक्टर) साहब की सलाह को मानना सही होगा, ऐसा लगता है।“ दिनकर राव जवलकर के भाषण के बाद सूबेदार घाटगे ने कहा कि ”मैं
खुद पेन्शनर सूबेदार हूं। सत्याग्रह में हिस्सा लूंगा तो मेरी पेंशन पर आंच आएगी, यह मैं जानता हूं। इसके बावजूद सत्याग्रह करने के लिए मैं पुणे से यहां आया हूं। एक बात मैं जरूर कहना चाहूंगा कि मैं स्पृश्य लोगों के खिलाफ सत्याग्रह करने आया था। लेकिन ये लोग खुद सरकार की आड़ में छिप कर हमें और सरकार को आपस में भिड़ाना चाहते हैं। सो इस लड़ाई में कूदने से पहले हमें पूरी तरह सोच-विचार करना होगा। सरकार दुराग्रही होती तो हमें इस लडाई में कूदना ही पड़ता। लेकिन कलक्टर साहब के भाषण से ऐसा लगता नहीं। हमारे लिए उनके मन में सहानुभूति है। फिर बेवजह सरकार से भिड़ना क्यों? आज हमने जो उत्साह दिखाया, वह बहुत ही अपूर्व है। मैं उसके लिए आपका अभिनंदन करता हूं। इतना उत्साह हो तो आपको सफलता भी जरूर मिलेगी। हालांकि, बदले हुए हालात देख कर आपको सब्र करना होगा ऐसा मुझे लगता है। मेरी आपसे यही विनती है।“ कलक्टर साहब को जल्द लौटना था, सो इसके बाद बाबासाहेब ने उनके प्रति आभार प्रदर्शन किया। और उन्हें छोड़ आए। हालांकि, कलक्टर साहब के भाषण का सत्याग्रह के लिए आए लोगों पर कोई असर हुआ हो, ऐसा नहीं लगा। क्योंकि ऐसा लगा जैसे कलक्टर साहब के जाने के बाद वक्ता जब उनके बारे में बोलने लगे तब सत्याग्रह के खिलाफ बोलने वाले वक्ताओं की बातें सुनने के लिए लोग तैयार नहीं थे। हालांकि राजमान्य कृष्णाजी दावणे तथा सुश्री शांताबाई शिंदे जैसे सत्याग्रह के पक्ष में बोलने वाले वक्ताओं के भाषण पर तालियां बजीं। शाम के 7 बजे तक यही बहस चल रही थी। तब डॉ. अम्बेडकर ने बताया कि आज रात एक बार फिर बैठ कर, इस पर विचार किया जाएगा। कल सुबह पक्का निर्णय लिया जाएगा। उन्होंने सभा समाप्ति की घोषणा की।
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तीसरा दिन
दूसरे दिन शाम की बैठक समाप्त होने के बाद जैसा कि तय हुआ था रात में एक बार फिर कुछ चुनिंदा लोगों की बैठक हुई। उसमें गर्मागर्म बहस हुई। और आखिर इस बात पर सहमति हुई कि फिलहाल सत्याग्रह टाल दिया जाए। फिलहाल गांव में से जुलूस निकला जाए और तालाब के चारों तरफ जुलूस को घुमाया जाए। रात में ही इस बात की सूचना कलक्टर साहब के पास पहुंच गई। फिर यह सवाल उभरा कि आखिर सत्याग्रह को फिलहाल टालने का प्रस्ताव सभा के सामने किसके द्वारा रखा जाए। डॉ. अम्बेडकर ने अगर प्रस्ताव रखा है तो ही उसको सबका समर्थन मिलता। सभा केवल उनकी बात मानती, किसी और की नहीं, यह सब जानते थे। उसी के अनुसार तय हुआ कि डॉ. अम्बेडकर ही इस प्रस्ताव को प्रस्तुत करें और