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अस्पृश्य होते हुए भी अस्पृश्यों के आंदोलन में
सहभागी न होना लांछन है
25 से 27 दिसंबर, 1927 दरमियान महाड़ में हुई सत्याग्रह परिषद से वहां के चमार समाज में भी हलचल मचा दी। वे मानों गहरी नींद से हड़बड़ाकर जाग गए। 27 दिसंबर, 1927 की शाम को चमारों की बस्ती में सभा का आयोजन तय कर डॉ. अम्बेडकर को वहां आमंत्रित किया गया। उनके अनुरोध का सम्मान करते हुए डॉ. अम्बेडकर अपने मित्रों और साथियों के साथ शाम साढे़ सात बजे चमारों की बस्ती में गए। महाड़ में चमारों की बहुत बड़ी बस्ती है। उसी अनुपात में सभा के लिए चमार बड़ी संख्या में उपस्थित हुए थे। पहले श्री रा. ना. वनमाली, श्री गिरिजाशंकर शिवदास, एल. आर. चांगोरकर, श्री गोविंद झिपरू जाधव आदि के सामाजिक विषयों पर स्फूर्तिदायी भाषण हुए। उसके बाद डॉ. अम्बेडकर बोलने के लिए खड़े हुए और उन्होंने कहा कि,
”गिने चुने लोगों को छोड़ दें तो बाकी चमार लोग सत्याग्रह जैसे कार्यक्रमों में हिस्सा नहीं लेते यह बडे़ अचरज की बात है। इसके पीछे क्या कारण हैं, मैं नहीं जानता। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि महार समाज की मदद करने में आप हिचकिचाते क्यों हैं? आप खुद सत्याग्रह की तरह का बड़ा कार्य करने की सोचें तो वह आपसे निभ नहीं पाएगा ऐसा मुझे लगता है। क्योंकि, आपकी जनसंख्या बेहद कम है। इसलिए महार लोगों की तरह बहुसंख्यक लोगों के साथ कार्यक्षमता के नज़रिए से सहकारिता के बगैर आपके सामने कोई चारा नहीं है। साथ ही, आपको एक बात के प्रति आश्वस्त रहना चाहिए कि महारों के साथ काम करने से, उन्हें अपना सहयोग देने से आपकी जाति भ्रष्ट नहीं होगी। सच पूछो तो सत्याग्रहियों का समूह वीरों का समूह है। और वीरों के समूह में जातियों के खयालों का कोई स्थान नहीं, यह बात पेशवाओं के ब्राह्मणों वाले शासन काल में भी मानी गई थी। ऐसा अगर न होता तो सिदनाक महार का तंबू मराठों की छावनी में रहने नहीं दिया जाता। इसके बावजूद कोई आपसे यह नहीं कह रहा कि आप अपनी जाति छोडि़ए। सच पूछो तो आप धनवान हैं, व्यापारी हैं, खाते-पीते हैं। असल में आप लोगों को हमारी मदद करनी चाहिए। आप लोग जूते न देने का सत्याग्रह कर सकते हैं। आपके समाज में इतना सामर्थ्य है फिर भी आप उसका इस्तेमाल नहीं करते। इसे आप की लापरवाही कहें या हद दर्जे का आलसीपन कहें, यह मेरी समझ में नहीं आ रहा। आप खुद तय कीजिए कि आप सुख चाहते हैं या इंसानियत। इंसानियत के बगैर आपका वैभव व्यर्थ है। आप जैसे आज़ाद और सुखी लोगों को अस्पृश्यों को इंसानियत दिला देने के काम में उत्सुकता के साथ हिस्सा लेना चाहिए। थोड़ा