18. अस्पृश्य होते हुए भी अस्पृश्यों के आंदोलन में सहभागी न होना लांछन है - दिसंबर 1927 महाड - Page 147

130 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पुण्य आपको भी कमा लेना चाहिए। इसमें अगर आप हिस्सा लेते हैं तो महारों के साथ इतिहास में आपका नाम भी जुड़कर अमर हो जाएगा। वरना आपकी अगली पीढ़ी आपको दब्बू होने का दोष देगी।“ ख्1,

डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के संबोधन के बाद श्री एस. एन. शिवतरकर ने कहा, कि आप अस्पृश्योद्धार के कार्य में हिस्सा नहीं ले रहे हैं, इसलिए आपको डरपोक भीरु माना जा रहा है। आप अपने कर्त्तव्य से चूक रहे हैं। यह कार्य सिर्फ अस्पृश्यों का नहीं है, यह तो पूरी मानव जाति का काम है। लेकिन अस्पृश्य होते हुए भी आप इसमें हिस्सा नहीं ले रहे हैं यह आपके लिए लांछन की, कलंक की बात है। ब्राह्मणों के विचार अपनी प्रगति में बाधक हैं, इसलिए उन विचारों से आप प्रभावित न हों, इसे स्वतंत्रता प्राप्ति कार्य में सहभाग लें और सहकार करें। उनके बाद श्री पां. ना. राजभोज ने कहा कि, चमार लोग भटों के - ब्राह्मणों के विचारों से प्रभावित हो रहे हैं यह देखकर मुझे बड़ा दुख हो रहा है। उससे भी अधिक व्यथित मैं मातंग लोगों के समाज की दशा को देखकर होता है। चमार लोग अन्य अस्पृश्यों की तुलना में बेहतर स्थिति में हैं, लेकिन पढे़-लिखे न होने कारण वे अपने कर्त्तव्यों से अनभिज्ञ हैं। आज अस्पृश्य नेताओं पर संकट छाया हुआ है। ऐसे समय आपको द्वेष भावना और जलन को त्याग देना चाहिए। जातिभेद बहुत ही भयंकर बात है। उसे भुला कर आप महार लोगों की सहायता करें। सत्याग्रही बनें। इसी में हम सबका हित है। उनके संबोधन के बाद श्री सहस्त्रबुद्धे ने कहा, बैरिस्टर साहब आपके कुल में पैदा हुए और आज विलायत जाकर विद्वान ब्राह्मणों से भी अधिक विद्वान होकर आए। इसीलिए, आज मैंने ब्राह्मण होते हुए भी उनका शिष्यत्व स्वीकार किया है। आपको भी इसी तरह उनसे सीख लेनी चाहिए। जातिभेद को खत्म करें और अस्पृश्योद्धार के काम में सहयोग करें। बैरिस्टर साहब के साथ मैं हमेशा खाना खाता रहा हूं, उससे मुझे कुछ नुकसान नहीं पहुंचा है। खाने-पीने के भेदभाव को आप लोग बेकार में तूल ना दें। उसके बाद श्री वनमाली ने कहा, आप लोगों ने सत्याग्रह में हिस्सा नहीं लिया, इस बारे में मुझे बहुत अफसोस है। अपना कर्त्तव्य निभाने का यह मौका बेकार ना गंवाएं। कर्त्तव्य निभाएंगे तो इतिहास में आपका भी नाम अमर होगा। इस प्रकार भाषण हुए। उसके बाद चायपान हुआ और अध्यक्षों के प्रति धन्यवाद अर्पण करने के बाद करीब 9 बजे सभा बर्खास्त हुई।

डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के साथ आए लोगों के चमारों की बस्ती से लौटने के बाद रात 10 बजे एक बार फिर सत्याग्रह परिषद की शुरुआत हुई। धुले जिले के

खादी प्रसारक मंडल के आद्य प्रवर्तक रा. देव का व्याख्यान तय था। उनके आने में

  1. ”बहिष्कृत भारत“, 3 फरवरी, 1928