18. अस्पृश्य होते हुए भी अस्पृश्यों के आंदोलन में सहभागी न होना लांछन है - दिसंबर 1927 महाड - Page 148

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थोड़ी देर होने के कारण श्री गणपतबुवा जाधव का और श्री कांबले का भगवान और भक्त विषय पर हास्य से भरा कीर्तन हुआ जो करीब आधे घंटे पन्द्रह-पन्द्रह मिनट चला। लोगों पर इसका काफी असर हुआ। रा. देव के भाषण के बाद परिषद के काम की शुरूआत हुई। पहले श्रीयुत वामनराव पत्की और कमलाकर टिपणीस इन दो कायस्थ जाति के युवकों को धन्यवाद देने तथा सम्मानस्वरूप सत्याग्रह समिति की ओर से उन्हें सोने की अंगूठियां अर्पण करने का प्रस्ताव रखा गया। इस प्रस्ताव पर श्रीयुत संभाजी गायकवाड़, गोविंद रामजी आडे़रकर हवलदार और श्रीयुत मोरे के भाषण हुए। इसी प्रस्ताव पर बोलते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि,

इन दोनों युवाओं का काम उनके कुल और जाति के शोभा देने वाला ही है। ब्राह्मणवर्ग द्वारा कायस्थ लोगों पर कमतरी का ठप्पा लगा कर उन्हें हीन मानने का काम कइयों बार किया। लेकिन हर बार उन्होंने इन हालातों का सामना कर ब्राह्मण जाति के इस काले कारनामों पर अंकुश लगाया। समता की लड़ाई लड़ चुकी कायस्थ जाति को समता की लड़ाई लड़ने वाले अस्पृश्य समाज के बारे में सहानुभूति महसूस कर इस कार्य में उनका सहयोग देना स्वाभाविक है।“ उसके बाद श्रीयुत कमलाकर टिपणीस और श्रीयुत पत्की के इसके लिए आभार व्यक्त करने वाले भाषण हुए। उसके बाद, महाड़ म्युनिसिपालिटी के अध्यक्ष रा. सुरेंद्रनाथ टिपण् ास बोलने के लिए उठ कर खडे़ हुए। हिंदू धर्म की रक्षा के लिए अस्पृश्य वर्ग की कितनी जरूरत है इसका उन्होंने विस्तार से वर्णन किया। उनके बाद बोलते हुए श्री रा. शांताराम पोतनीस ने कहा, सभी गूजर और ब्राह्मण समाज अगर पलट भी जाए तब भी हम तन, मन, धन से मदद करते रहेंगे। कायस्थों में से कुछ पुराने लोग भी आपके विरोध में हैं। लेकिन हम रŸाभर भी उनकी परवाह नहीं करते। चवदार तालाब पर जाने के लिए अस्पृश्य लोगों को जब तक इजाज़त नहीं मिलती तब तक मैं भी वहां पर पानी नहीं पिऊंगा।

इससे अगला प्रस्ताव डॉ. अम्बेडकर ने खुद रखा। वह कुछ इस प्रकार था - ”सत्याग्रह परिषद के लिए जिन्हें नियुक्त किया गया है, उन प्रचारकों को रा. शिवराम गोपाल जाधव, संभाजी तुकाराम गायकवाड़, भाऊ बालू वारंगकर, पंढरीनाथ रामचंद्र आसूडकर, भाविकनाथ बुवा फलानकर और पांडुरंग महादेव वोउरकर ने अपना काम बेहतर ढंग से पूरा किया है इसलिए, यह परिषद उनके प्रति आभार प्रकट करती है। रा. बोऊरकर, सखाराम, गोपाल आचलोलकर, महादेव आचलोलकर ने परिषद के कार्य के लिए अपने आप को समर्पित किया इस बात पर गौर करते हुए उन्हें एक-एक चांदी का तमगा पुरस्कार स्वरूप दिया जाता है। ख्1,

  1. ”बहिष्कृत भारत“, 3 परवरी, 1928