19. अस्पृश्यों की उन्नति और महिलाओं की जिम्मेदारी - दिसंबर 1927 महाड - Page 149

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दिनांक 27 दिसंबर, 1927 को दोपहर परिषद का समापन कर प्रतिनिधि भोजन के पंडाल की तरफ बढे। डॉ. बाबासाहेब परिषद के दफ्तर में पहुंचे। वहीं उनके ठहरने का इंतजाम किया हुआ था। वहां जाकर वे अभी पहुंचे ही थे कि उन्हें देखने के लिए महिलाओं की भीड़ वहां उमड़ पड़ी। ये महिलाएं दूर दूर से - करीब नौ-दस मील की दूरी से खास डॉ. अम्बेडकर को देखने के लिए वहां पहुंची थीं। डॉ. अम्बेडकर को देखने की ऐसी ललक उनमें जगी थी कि उनमें से कई महिलाएं अपने दूध पीते बच्चों को पीछे छोड़ कर आई थीं। शाम के समय तो महिलाओं की और भीड़ उमड़ी। उनमें से एक वृद्ध महिला आईं और डॉ. अम्बेडकर को देखकर जोर-जोर से रोने लगी। देखकर लोगों को यकीन-सा हो गया कि हो न हो इसे किसी स्पृश्य गुंडे ने पीटा होगा। इसलिए लोगों ने उससे पूछना शुरू किया, कि बताओ तुम रो क्यों रही हो? तुम्हें किसने मारा? तब उसने कहा कि मुझे किसी ने नहीं मारा। लेकिन मैं जब इस तरफ आ रही थी, तब रास्ते में कुछ दुष्टों ने मुझसे कहा कि तुम्हारे राजा स्वर्ग सिधार गए। तब जाकर उसके रोने का और अचानक इतनी महिलाओं के आने का कारण लोगों की समझ में आया। सच्चे प्रेम की डोर में बंधा महिला वर्ग इस प्रकार अपने को देखने आया हुआ पाकर डॉ. अम्बेडकर ने इस मौके का फायदा उठाते हुए महिलाओं को समाजहित की दो बातें बताने का निर्णय लिया। उन्होंने महिलाओं से कहा कि मैं आपको समाज हित की दो बातें कहना चाहता हूं, इसलिए मेरी विनती है कि आप शाम की परिषद के लिए उपस्थित रहें। महिलाओं ने उनकी बात मानी।

चमारों की बस्ती का कार्यक्रम पूरा होने के बाद डॉ. बाबासाहेब ने महिला वर्ग को उद्देश्य कर भाषण दिया। उसके बाद जाति के पंच, म्हेत्रे आदि अधिकारियों ने उनका मार्गदर्शन किया। तय कार्यक्रमानुसार आखिर वाले और सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्यक्रम की शुरुआत अध्यक्ष महोदय ने कर दी। यह आखिरी कार्यक्रम इतना महत्त्वपूर्ण था कि परिषद के कुल कार्यक्रमों मे से महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम तय करना हो तो इसे ही प्रमुखता दी जाए। यह कार्यक्रम इतनी गंभीरता से पूरा किया गया कि सभी उपस्थितों को अपने कर्त्तव्यों के बारे में बड़ी तीव्रता से अहसास हुआ। इन कार्यक्रमों का पहला कार्यक्रम था महिला वर्ग के लिए व्याख्यान देना। दोपहर में तय कार्यक्रम के अनुसार सभी महिलाएं लिहाज छोड़ कर आईं और समारोह स्थल में बैठ गईं। उनके बैठने के लिए बीच में ही जगह खाली रखी गई थी। उन्हें संबोधित करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा,

* ”बहिष्कृत भारत“, 3 फरवरी, 1928