19. अस्पृश्यों की उन्नति और महिलाओं की जिम्मेदारी - दिसंबर 1927 महाड - Page 150

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”आप इस सभा में आईं इसलिए मुझे बेहद खुशी हो रही है। घर-गृहस्थी की मुश्किलों को जिस तरह पुरुष और स्त्री मिल कर हल करते हैं, उसी तरह समाज की गृहस्थी की अड़चनें भी पुरुषों और महिलाओं को मिल कर सुलझानी चाहिएं। केवल पुरुष अपने सिर पर ये काम लें तो उन्हें उसे पूरा करने में काफी समय लग सकता है। उसी काम को अगर महिलाएं अपने सिर पर लेती हैं तो उन्हें जल्द से जल्द सफलता मिल सकती है ऐसा मुझे लगता है। हालांकि अगर वे खुद इस काम को करने में असमर्थ हों तब भी जो पुरुष इस काम में लगे हुए हैं, उन्हें उनका साथ देना चाहिए। इसके लिए आगे से आप इस परिषद के लिए हमेशा उपस्थित रहें, यह मेरा आपसे अनुरोध है। सच पूछो तो अस्पृश्यता हटाने का सवाल पुरुषों का नहीं आप महिलाओं का ही है। आप ही ने हम पुरुषों को जन्म दिया है। अन्य लोग हमारे साथ जानवरों से भी बुरा सलूक करते हैं यह आप जानती हैं। कुछ जगहों पर तो हमारी छाया को भी अपवित्र माना जाता है, उससे लोग दूर रहते हैं। अन्य लोगों को कोर्ट-कचहरी में सम्मान का स्थान मिलता है, लेकिन आपके पेट से जने हमें पुलिस में चपरासी की नौकरी तक मिलती नहीं। इतना हमारा दर्जा हीन है। यह सब जानते हुए भी आपने हमें क्यों जन्म दिया?- यह सवाल अगर कोई आपसे पूछे तो क्या आप उसका जवाब दे पाएंगी? इस सभा में उपस्थित कायस्थ और अन्य स्पृश्य महिलाओं के पेट से जने और आपके पेट से जने बच्चों में क्या फर्क है? ब्राह्मण महिलाओं में जितना शील है उतना शील आपमें भी है। ब्राह्मण महिलाओं में जितना पतिव्रत्य है, उतना आपमें भी है और आपके पास जितना मनोधैर्य, स्वाभिमान, दृढ़प्रतिज्ञता, हिम्मत और साहस है, उतना उनके पास नहीं। इन स्थितियों में ब्राह्मण महिला के पेट से जने बच्चों को सर्वमान्यता क्यों मिले और आपके पेट से जने बच्चे को हर जगह बेइज्जती क्यों सहनी पडे़? उसे इंसानियत के अधिकारों तक से वंचित क्यों रखा जाता है? इस बारे में क्या आपने कभी सोचा है? आपने अगर सोचा होता तो पुरुषों से पहले आप ही सत्याग्रह करतीं। क्योंकि, आपके पेट से जनने का ही पाप उसके हाथ से हुआ है। उसी पाप के कारण हमें अस्पृश्यता का यह शाप भुगतना पड़ रहा है। इसलिए आपको सोचना चाहिए कि अन्य महिलाओं के पेट से जनना पुण्य कैसे हो सकता है? और आपके पेट से जन्म लेना पाप क्यों हो? इस सवाल पर सोचोगे, तो या तो आपको बच्चे पैदा करना बंद करना होगा या फिर आपके कारण लगा कलंक उसे साफ कराना होगा। आपको चाहिए कि इन दो मार्गों में से किसी एक मार्ग को आप अपनाएं। आप प्रतिज्ञा करें कि, हम ऐसी कलंक भरी स्थिति में नहीं जीएंगे। पुरुषों ने जिस तरह समाजोन्नति करने का निश्चय किया है, उसी प्रकार का निश्चय आप भी करें। एक और बात आपसे कहनी है कि, आप सब लोग पुराने और गंदे रीति-रिवाजों का पालन करना छोड़ दें। असल में अगर देखा जाए तो, अस्पृश्य व्यक्ति की अस्पृश्यता का ठप्पा उसके माथे पर मारा हुआ नहीं होता।