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दिनांक 27 दिसंबर, 1927 के दिन महाड़ सत्याग्रह परिषद में महिलाओं को उनकी जिम्मेदारी का बोध करा देने के बाद डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने जाति के पंच, म्हेत्रे आदि अधिकारी लोगों को इकट्ठा कर बताया कि,
आज मैं आपको जो कुछ बताने जा रहा हूं वह सुन कर आप गुस्सा मत होना। मैं पंच का बच्चा हूं। अगर कोई गलती हो जाए तो माफ करना। हमारे बाप-दादाओं ने पंचों की व्यवस्था की वह बहुत अच्छी बात थी ऐसा मुझे लगता है। हर समाज के रीति रिवाज तय हो जाते हैं। उन्हीं रीति-रिवाजों के अनुसार सबको बरतना होता है। अगर कोई जाति के रिवाजों के अनुसार बर्ताव नहीं करता है तो उसे ठीक करने के लिए जाति को ओर से बहिष्कार या दंड की व्यवस्था होती है। यह सजा देने का काम जाति ने आप म्हेत्रे लोगों को सौंपा है। इससे आप लोगों को पता चलेगा कि समाज में आपकी क्या योग्यता है, आपका स्थान कितना ऊंचा है। आप समाज के न्यायाधिकारी और धर्माधिकारी लोग हैं। आप जैसा धर्म लोगों को बताएंगे और आप जैसा न्याय करेंगे उसी के अनुसार समाज में अच्छाई-बुराइयों का चलन होगा। लेकिन सभी लोगों का आप पर ऐसा आरोप है कि आप, ”बेली वहां बोली“ के हिसाब से बर्ताव करते हैं। यानी जहां कुछ मिले उस ओर झुक जाते हैं। सच को झूठ और झूठ को सच बना देते हैं। इसीलिए समाज में अधर्म बढ़ रहा है। इस सबके लिए आप ही जिम्मेदार हैं। इसलिए मैं आपसे जो कहना चाहता हूं, वह यह कि आप अपना कर्त्तव्य पहचानिए। समय बदल रहा है इसका खयाल रखिए। बदले हुए समय में क्या करना चाहिए इस पर गौर कीजिए। पुराने रीति-रिवाजों को त्याग कर उनकी जगह नए रीति-रिवाजों की नींव आपको रखनी होगी। इतना ही नहीं, नई रीति से जहां-जहां लोग मुख मोडे़गे वहां-वहां उन्हें सही रास्ते पर ले आने के लिए बहिष्कार के अस्त्र का प्रयोग करना होगा। यह करने के लिए अगर आप तैयार हैं तो हम आपकी परंपरा से चली आ रही गद्दी को मान लेने के लिए तैयार हैं। अगर आप यह मानना नहीं चाहते तो नई सोच वाले, नई नीति को अपनाकर चलने वाले पंचों की नियुक्ति कर आपके अधिकार हमें छीनने होंगे। बदले हुए हालात में अपनी जाति के लिए कौन से नियम लागू करना ठीक रहेगा, इस पर सोच-विचार करने के लिए मैं सभी म्हेत्रे लोगों की सभा बुलाऊंगा। उस सभा में जो नियम सबकी राय से पारित होंगे उन पर अमल करने के बारे में आप जागरूक रहेंगे, ऐसी उम्मीद मैं करता हूं।
* बहिष्कृत भारत : 3 फरवरी, 1928