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स्पृश्यों को अस्पृश्यों के बजाय स्पृश्यों को उपदेश देना चाहिए *
निवृŸानाथ की यात्रा के लिए श्रीक्षेत्र त्र्यंबकेश्वर में अस्पृश्य लोगों का बड़ा मेला
लगता है। उसका फायदा लेकर लोकजागृति करने के इरादे से वहीं एक सभा का
आयोजन करने के उद्देश्य से विज्ञापन बनाए गए थे। उसके अनुसार यात्रा के दिन
यानी बुधवार दिनांक 18 जनवरी, 1928 के दिन सभा बुलाई गई थी। सभा का अध्यक्ष
स्थान डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को दिया गया था। सभा में महिलाओं और पुरुषों का
बड़ा जमावड़ा उपस्थित था। महिलाओं की उपस्थिति अधिक थी। सभा में मुख्यरूप
से त्र्यंबकेश्वर में श्री चोखोबा का मंदिर बनाया जाए अथवा नहीं यही एक महत्वपूर्ण
सवाल था। इसके बावजूद डॉ. अम्बेडकर ने अपने भाषण में अस्पृश्य वर्ग के सभी
सवालों का विस्तार से, हर पहलू पर प्रकाश डालते हुए विवेचन किया और बताया
कि श्री चोखोबा का मंदिर बनाने के बजाय चोखोबा द्वारा शुरू किए गए अस्पृश्यता
निवारण के कार्य को पूरा करने के लिए हमेशा कोशिश करना यही चोखोबा राय का
असल स्मारक होगा। उन्होंने सुझाव दिया, कि अगर आप यह कार्य करना चाहते
हैं और ‘बहिष्कृत भारत’ पत्रिका खत्म न हो, ऐसी आपकी अगर मंशा है, तो हमारे
द्वारा शुरू किए गए बहिष्कृत भारत फंड में सब मदद करें। उसके बाद श्री भाऊराव
गायकवाड़, रा. भालेराव, पुंजाजी नवसाजी जाधव आदि सज्जनों के भाषण हुए। इस
सबका इतना अधिक असर हुआ कि उसी जगह 203 रुपयों की रकम इकठ्ठा हुई।
सार्वजनिक कार्य के बारे में जिन्हें कुछ भी पता नहीं था, उन गरीब बेचारी महिलाओं
ने और साधुओं ने भी अल्प-स्वल्प चंदा दिया। सभा का कामकाज साढे़ चार बजे
तक पूरा किया ही जाना चाहिए क्योंकि उसके बाद सभी लोगों को पालखी के जुलूस
में जाना है, यह पहले से ही तय किया हुआ था। इसी कारण सभा की शुरुआत
दो बजे की गई थी। पांच बजे के आसपास सभा पूरी होती। लेकिन उसी समय
नासिक के दातार शास्त्री और ‘स्वराज’ पत्र के संपादक रा. मराठे आए और लोगों
का भी पालखी के जुलूस से अधिक ध्यान सभा में ही लगा हुआ था, यह देखते हुए
सभा का समय थोड़ा और बढ़ाने का निर्णय लिया गया। बाद में दातार शास्त्री और
मराटे की अस्पृश्यों के आंदोलन के बारे में सहानुभूति दर्शाने वाले भाषण भी हुए।
भाषण जब चल ही रहे थे रा. थोरात, वाडेकर और जलगाव के चौधरी आदि लोग
पहुंचे। उनके भी भाषण हुए। अपने भाषण में रा. थोरात ने साफ तौर पर बताया कि,
अस्पृश्यों से अपने पैरों पर खडे़ होने के लिए कहना मूर्खता है। हम स्पृश्य लोगों को
उनकी अस्पृश्यता नष्ट करने की कोशिश करनी चाहिए। उसके बाद रा. भाऊराव
* ”बहिष्कृत भारत“, 3 फरवरी, 1928