21. स्पृश्यों को अस्पृश्यों के बजाय स्पृश्यों को उपदेश देना चाहिए - जनवरी 1928 श्रीक्षेत्र त्र्यंबकेश्वर - Page 156

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गायकवाड़ ने अपने भाषण में स्पृश्यों ने अस्पृष्यों के खिलाफ जो मुद्दे रखे थे, उनका

खंडन किया। उसके बाद डॉ. अम्बेडकर ने इन सब बातों को समेट कर कार्यक्रम का सम्मान करते हुए कहा कि,

”आप अगर हमारे लोगों के बारे में सहानुभूति रखते हैं तो आप हमारे लोगों की सभा में आकर भाषण देने के बजाय स्पृश्य लोगों की सभा लेकर उस सभा में हमारे प्रति सहानुभूति निर्माण करने की कोशिश करें तो अधिक बेहतर रहेगा। मराठा लोगों से भी उन्होंने कहा कि, आप शहर में सभा लेने के बजाय गांव में सभा बुलाइए। क्योंकि, जैसे आपने कुलाबा जिले का हाल देखा है, उसी तरह गांवों के मराठे लोगों की स्थिति भी बिल्कुल उजड्डों की तरह है। उन्हें कुछ सिखाने की कोशिश आपको करनी चाहिए।“ इस प्रकार का भाषण होने के बाद सभा का कामकाज पूरा किया गया। और सभा बडे़ आनंद के साथ संपन्न हुई। ऐसे में, ‘स्वराज्य’ पत्रिका के संपादक ने डॉ. अम्बेडकर के भाषण का विपरीत अर्थ निकाल कर उस पर टीका-टिप्पणी की। उन्होंने जो भी कुछ लिखा उसे पढ़ने के बाद उस सभा में उपस्थित हर किसी को यकीन होगा कि स्वराज्य पत्रिका का संपादक एक नीच प्रवृŸा का इंसान है। सो, इस विषय में और अधिक लिखने की जरूरत नहीं है।