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मंगलवार, दिनांक 25 सितंबर, 1928 के दिन रात 8 बजे मुंबई के दादर गणेशोत्सव में एक साथ डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर और पुणे के श्री बापूसाहब माटे के भाषण आयोजित किए गए थे। लेकिन गला खराब होने का बहाना बना कर श्री माटे आए ही नहीं। उनके न आने से स्पृश्य सनातनियों को निराशा हुई थी। इसी प्रकार इस सभा में डॉ. अम्बेडकर को मात देने के, उनकी सभा में दंगल अथवा कोई समस्या
खड़ी करने के सभी मंसूबों पर पानी फिर गया था। इसके बावजूद, इस सभा में डॉ. अम्बेडकर अगर स्पृश्य वर्ग के बारे में कुछ बोले तो उन्हें उसका मजा चखाने का प्लान भी उन्होंने बना लिया था। यह पूरी हकीकत गुरुवर्य केलुस्कर जी को पता चलते ही वे खास कर इस सभा में उपस्थित रहे थे।
लेकिन डॉ. अम्बेडकर का भाषण ही इतना व्यवस्थित, बढि़या और असरदार हुआ कि सभा में हुल्लड़ मचाने के उद्देश्य से वहां इकट्ठा हुए लोग डॉ. अम्बेडकर की महानता के गीत गाते हुए अपने घरों को लौटे।
डॉ. बाबासाहेब ने यह सभा जीत ली थी। अपने भाषण में उन्होंने कहा था -
मैंने तय किया है कि मैं आज, ”अस्पृश्यता निवारण का अस्पृश्यों द्वारा चलाया गया आंदोलन और उस पर ब्राह्मणादि स्पृश्य जातियों की आपिŸायां पर विचार“ इस विषय पर आपके सामने बोलूं। विषय का नाम छोटा नहीं है, काफी लंबा है, लेकिन मैं यह भी चाहता हूं कि समय की कमी को देखते हुए आपके ऊब जाने तक इस पर चर्चा लंबी न खिंच जाए।
हमारे आंदोलन को लेकर तीन आपिŸायां जताई जाती हैं। पहली आपिŸा यह कि हम स्पृश्य वर्ग को सहयोग न देकर अलग से आंदोलन चलाते हैं। दूसरी आपिŸा यह कि, हमारी नीति हमला करने की होती है। तीसरी आपिŸा कि हम जातिभेद और अस्पृश्यता इन दो अलग-अलग बिंदुओं को बेवजह मिला देते हैं और इसीलिए अस्पृश्यता निवारण का दिन दूर ढकेलने का कारण बनते हैं।
पहली आपिŸा के बारे में बोलना हो तो सहयोग न देने का यहां मतलब अगर आत्मनिर्भरता के सिद्धांत पर आधारित और अलग से अगर आंदोलन चलाना है, तो यह आरोप बिल्कुल सही है। लेकिन अगर इसका मतलब यह है कि हम किसी की सहायता नहीं लेना चाहते या किसी भी स्पृश्य व्यक्ति के साथ सहकारिता से पेश नहीं
* समता : 5 अक्तूबर, 1928