22. अस्पृश्यता जातिभेद की पैदाइश है - सितंबर 1928 दादर (मुंबई) - Page 158

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आते तो यह गलत है। जो हमारा आदमी है, ऐसा हमें लगता है, तो फिर वह ब्राह्मण हो या गैर-ब्राह्मण हम उसे पूरा सहयोग देने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। इस संघ का अध्यक्ष बनने का सम्मान मुझे प्राप्त हुआ है। जातिभेद को खत्म कर हिंदू समाज से अस्पृश्यता को समूल नष्ट करने के लिए अपनी अल्प शक्ति के अनुसार जो संघ पूरी कोशिश में लगा हुआ है, उस हमारे समाज समता संगठन में ब्राह्मण, गैर-ब्राह्मण, अस्पृश्य आदि सभी जातियों के लोग शामिल हैं। किसी के आने पर कोई पाबंदी नहीं है। अस्पृश्यों ने अपने आंदोलन की बागडोर अपने हाथ में ले ली इस घटना में भी अब कोई अनहोनी बात नहीं रही। कोई समाज अथवा वर्ग अगर बेहद दयनीय स्थिति में होता है तब उसकी सहायता कर, हाथ देकर ऊपर उठने में उच्च वर्ग के कुछेक लोग ही उसकी सहायता करते हैं। इंडियन नेशनल काँग्रेस की स्थापना करने में कुछ अंग्रेज लोगों ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। इंग्लैंड में मजदूर पक्ष निर्माण करने में उदार मतवादी, लिबरल लोगों की कोशिशें ही पहले सहायकारी बनीं। लेकिन शुरू-शुरू में सहायता करने वाले अगडे़ वर्ग के लोगों की सहायता पिछडे़ वर्ग के लोगों को निश्चित सीमा तक ही उपलब्ध हो सकती है। एक सीमा के बाद वे पिछडे़ वर्ग के साथ नहीं आ सकते। इतना ही नहीं, जो पहले मददगार होते हैं, वे आगे चल कर उनके प्रतिस्पर्धी, विरोधी और दुश्मन बन जाते हैं। किसी जमाने में सहायक और आश्रयदाता होने वाली लिबरल पार्टी इन्हीं वजहों से आगे चल कर लेबर पार्टी की कट्टर दुश्मन और प्रतिस्पर्धी बनी हुई हम देखते हैं। लेकिन केवल इस वजह से मजदूर पार्टी एहसान फरामोश है अथवा उसे अलग से आंदोलन नहीं करना चाहिए ऐसा कोई भी सोचने समझने वाला आदमी नहीं कहेगा।

अस्पृश्यता निवारण आंदोलन का भी लगभग ऐसा ही इतिहास है। ब्राह्मण अथवा मध्यम वर्ग के कुछ सुधारवादी और उदार मतवादी लोगों ने पहले अस्पृश्यों को सहायता प्रदान की। स्व. आगरकर, रानडे आदि लोग कहते कि अस्पृश्यों को स्पर्श करने में कोई हर्ज नहीं। उनकी सभाओं में उपस्थित रह कर उन्हें सुधार की, सहानुभूति की दो बातें भी बताया करते थे। इस बात के लिए अपनी जात वालों से उन्हें दो बातें सुननी भी पड़तीं। लोग उनकी निंदा करते। लेकिन इन सुधारकों का जिस जाति में जन्म हुआ, उन्हें उसी में कई सुधार करवाने थे। पिछड़े लोगों में या देसी मराठी भाषा में जिसे ‘पाट’ (पुनर्विवाह) कहते हैं उस तरह के पुनर्विवाह ब्राह्मण महिलाओं को करने चाहिए अथवा नहीं, विधवाओं का सिर मुंडाना शास्त्रानुसार है अथवा नहीं है, पुरुषों को लंबे बाल रखने चाहिए अथवा नहीं, महिलाओं को पढ़ाया-लिखाया जाए अथवा नहीं, इन्ही मध्यम वर्गीय सवालों के बारे में चर्चा करने में ही इन सुधारकों का समय व्यतीत हो जाता था। अस्पृश्यादी पिछडे़ वर्ग के लोगों के हितों से इस विचार का कोई संबंध नहीं होता था। ब्राह्मण विधवाओं के पुनर्विवाह हुए हों या विधवाओं