22. अस्पृश्यता जातिभेद की पैदाइश है - सितंबर 1928 दादर (मुंबई) - Page 159

142 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के केशवपन की रूढि़ भले बंद हुई हो, लेकिन अस्पृश्यता की रूढ़ी पर इन बातों से कोई असर नहीं होना था। अस्पृश्यता की रूढ़ी पर क्या इससे कोई अंतर पड़ा? बिल्कुल भी नहीं।

यह थी रानडे, आगरकर आदि महाराष्ट्रीय ब्राह्मण सुधारवादियों की समकालीन अस्पृश्यता निवारण कोशिशों की दिशाएं और सीमाएं। फिलहाल महाराष्ट्र में हिंदू महासभा वालों की कोशिशों की धूम मची हुई है। रानडे-आगरकर के अंदर सुधारों को लेकर जो तिलमिलाहट थी वह हिंदू शुद्धि संगठनवादियों के पास दिखाई नहीं देती। आत्मशुद्धि से अधिक दूसरे धर्मों की शुद्धि की तरफ और संगठन से अधिक आंकड़ों की तरफ ही उनका रुझान है। संख्या में अधिक होने के बावजूद केवल संगठन न होने के कारण आज हिंदू मजबूर हैं, सच्ची ताकत संख्या में नहीं होती यह वे जानते हैं, लेकिन जानबूझ कर इस तरफ से उन्होंने आंखें मूंद रखी हैं। इनमें से अधिकतर नेता हवा के रुख के साथ बदलने वालों में से हैं। उनके भरोसे रहें तो अस्पृश्यता के संकट से अपनी मुक्ति संभव नहीं, ऐसा अगर अस्पृश्यों को लगे तो इसमें उनका कोई दोष नहीं।

अपने ही लोगों की गुलामी से मानव जाति को बचाने के लिए दूसरी मानव जाति का निष्ठापूर्वक जुट जाने का केवल एक ही उदाहरण इतिहास में हमें दिखाई देता है और वह है - कृष्णवर्णिय नीग्रो लोगों को गुलामी की पीड़ा से मुक्ति दिलाने वाले अमेरिका के गोरों का। उस प्रसंग में भाई-भाई के साथ, बेटा-बाप के साथ, दोस्त-दोस्त के साथ भिड़ गए। जातिभेद पर कुठाराघात कर अस्पृश्यता का पाप हमारे देश से जड़ सहित नष्ट करने की कोशिश करने वाला एक धर्मवीर हमारे देश में पैदा हुआ था - गौतम बुद्ध। लेकिन ऐसे उदाहरण और ऐसी घटनाएं देश में बार-बार नहीं होतीं। इसीलिए ऐसा ही कुछ एक बार और घटेगा इस मूर्खताभरी उम्मीद पर हम अपने को सौंप नहीं सकते।

हमारी नीति हल्ला बोलने की है, विनम्रता से, नजर नीची रख कर हम अपनी मांगें नहीं रखते। सो, अस्पृश्यता निवारण के पक्ष में जो लोग होते हैं, वे भी हमारे रवैये के कारण प्रतिकूल बनते हैं, ऐसा हम पर आरोप लगाया जाता है। लेकिन इस प्रकार की आपिŸा उठाने वालों को लोकलाज न सही अपने मन के सामने तो शर्मिंदा होना चाहिए ऐसा मुझे लगता है। समाज क्या दुनिया भर में कोई दूसरा समाज अस्पृश्यों जितना विनम्र और लाचार है? क्या हम सदियों से विनम्र नहीं रहते आए हैं? पत्थर भी करुणा से पिघल जाएं, ऐसे दीन-हीन और विनम्र हालात में हमने दिन बिताए हैं। सो, कम से कम अब आप हमें विनम्रता और विनय के पाठ न पढाइए। ऐसे पाठ अब आप उच्च वर्णियों को ही पढाएं। प्रार्थनाएं, अर्जियां, प्रतिनिधिमंडल