22. अस्पृश्यता जातिभेद की पैदाइश है - सितंबर 1928 दादर (मुंबई) - Page 160

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आदि की सहायता से गंवाई हुई आजादी और हड़पे हुए अधिकार पाना अगर संभव होता तो उदारवादी पार्टियों के लोग अब तक हिंदुस्तान के राजा बनते और हिंदुओं की धर्मसŸा अस्पृश्यों के घर पर पानी भरती, आटा पीसती! हमें कोई उद्दंडता का अथवा सिर चढ़ कर बोलने का शौक नहीं है। दिन भर हाड़तोड़ मेहनत कर पेट के लिए दो कौर कैसे कमाए जा सकते हैं, यही हमारी दिन-रात की चिंता होती है। लेकिन रोटी से इंसानियत श्रेष्ठ होती है इसलिए हमने यह जंग छेड़ी है। ठोंके बगैर दरवाजे नहीं खुलते और छीने बगैर आपके हाथ से इंसानियत के हमारे अधिकार तक हमें दिए नहीं जाते।

तीसरी आपिŸा का जवाब देते हुए मैं शुरू में ही आपसे बस इतना कहना चाहूंगा कि हमारा अस्पृश्यता मिटाने का आंदोलन केवल अस्पृश्य वर्ग तक ही सीमित नहीं है। पूरे हिंदू समाज में व्याप्त इस जन्मजात अस्पृश्यता का खात्मा करना ही हमारे आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य है। इस उद्देश्य को पूरा कर पाना आसान नहीं। हमें इसका पूरा-पूरा अहसास है। हालांकि, हिंदू समाज के इस रोग को जड़ समेत उखाड़ फेंकने की सच्ची लगन हम अस्पृश्यों को ही लगी है। ब्राह्मणों के अलावा अन्य सभी जातियों को अस्पृश्यता का थोड़ा-बहुत संताप झेलना ही पड़ा है और वे झेल रहे हैं। ब्राह्मणों के बीच भी जातिविशिष्ट अस्पृश्यता और ऊंच-नीचता का भाव है। पूजा करते समय पलसीकर ब्राह्मणों के आने से अपवित्रता छा जाती है, ऐसा चित्पावन ब्राह्मण मानते हैं। कायस्थ महिला के स्पर्श से अपने कपडे़ अपवित्र न हो जाएं, इसलिए ब्राह्मण महिला कुंकुम की डिब्बी जमीन पर रखती है और कायस्थ महिला जमीन पर रखी डिब्बी से उठा कर कुंकुम का तिलक लगा लेती है। इस तरह स्पृश्य जातियों में ही अस्पृश्यता फैली हुई है। फर्क बस इतना ही है कि अस्पृश्य जातियों में उसने अति उग्र रूप धार लिया है। इसीलिए हम शूद्र वर्णियों का उच्चवर्णियों से मेलजोल खत्म हुआ और हम शूद्र बने। एक ही धर्मावलंबी होने के बावजूद हम मुसलमानादि अन्य धर्मियों की तरह स्पृश्य बनने के पश्चात् भी मुक्तता हमारे मन में अस्पृश्यता की जो भावना जडे़ बिछा कर जम चुकी हैं उससे हमें निजात नहीं मिल रही। बस हम उसी के लिए जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं। केवल स्पर्श की पावनता ही पानी होती तो हम अन्य धर्मों में जाकर आसानी से और बडे़ सम्मान के साथ उसे पा सकते थे। फिर तो इतनी खींचतान और रस्साकशी की जरूरत ही नहीं पड़ती।