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अपने साथ होने वाले अन्याय से छुटकारा पाने का एक और महत्वपूर्ण तरीका है, और वह है, सरकारी सŸा प्राप्त कर लेना! हमें चातुर्वर्ण्य की सीमा के बाहर रहना पडता है तब भी चातुर्वर्ण्य की सीमा को लांघ कर अगर अंदर प्रवेश पाना हो तो हमारे पास राजनीतिक सŸा होना जरूरी है। राजनीतिक सŸा के बगैर समाज में हमारा वर्चस्व हासिल नहीं हो सकता। फिलहाल महाराष्ट्र में केवल ब्राह्मणों का ही इतना अधिक वर्चस्व क्यों है? इसकी ओर भी कई वजह हो सकती हैं, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उनके हाथ में शक्तिशाली राजनीतिक सŸा है, इसे हमें नहीं भूलना चाहिए।
आजकल महाराष्ट्र के ब्राह्मणों की इतनी प्रभुसŸा क्यों है? इस बारे में इतिहास में एक कहानी मशहूर है। पेशवा काल से पूर्व मेरे प्रांत में रहने वाला बालाजी विश्वनाथ और उसके चित्पावन ब्राह्मण जातभाई निष्कपट अवस्था में, बेहद बुरी हालत में रहते थे। लेकिन जैसे ही उनके हाथ में राजनीतिक सŸा आई, उस समाज को महाराष्ट्र में प्रमुख स्थान प्राप्त हुआ है। उन लोगों ने सभी सत्ता में मुख्य पद हासिल कर लिया है। लेकिन आज अगर ब्राह्मण समाज को सरकारी नौकरी से बेदखल कर दिया जाए, तो ब्राह्मणों का प्रभुत्व खत्म हो जाएगा। अन्य प्रांतों में ब्राह्मणों का बिल्कुल प्रभुत्व नहीं है। गुजरात में ब्राह्मणों को पनिहारी और खानसामे के अलावा कोई महत्व नहीं है। संयुक्त और पंजाब प्रांत के ब्राह्मण यहां के महार और मांगों की तरह गीली रसोई (पका-पकाया भोजन) मांग कर खाते हैं। कुल मिला कर अपने अधिकारों को प्रस्थापित करने को लेकर या तो हमें हमला करने का, या राजनीतिक सŸा प्राप्त करने का मार्ग अपनाना होगा। इन्हीं दो मार्गों से हम अपनी अस्पृश्यता से निजात पा सकते हैं। अन्य समाज के साथ बराबरी का दर्जा पा सकते हैं। इतना कह कर और आपने मेरा भाषण शांति से सुना इसके लिए आपके प्रति आभार प्रकट कर मैं अपना भाषण पूरा करता हूं।“
परिषद में जो प्रस्ताव पारित हुए उन पर मेसर्स माने, वराले, आसोदे, इंगले, कोंडदेव, श्रीराम खोलवडीकर, कोल्हापुर के पोल (ढोर) और धारवाड के सांब्रराणी (ढोर) आदि प्रसिद्ध नेताओं ने अपने विचार प्रकट किए। उसके बाद सभी नेताओं को फूल मालाएं पहनाई गईं और गुलदस्ते अर्पण किए गए। इसी के साथ सभा का काम संपन्न हुआ।