25. गुलामी की व्यवस्था को नष्ट कर बुरे रीतिरिवाजों को तिलांजलि दो - अप्रैल 1929 चिपलून (रत्नागिरी ) - Page 167

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भारतीय बहिष्कृत समाज सेवक संगठन की ओर से रत्नागिरी जिले के खेड और चिपलुन तहसीलों से रत्नागिरी जिला बहिष्कृत परिषद का दूसरा अधिवेशन डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर की अध्यक्षता में चिपलून में शनिवार, दिनांक 13 अप्रैल, 1929 के दिन शाम 4.30 बजे हुआ था। इस अधिवेशन के लिए जो विशाल पंडाल खड़ा किया गया था वह बेलों और पताकाओं से सजाया गया था। वहां का प्रबंध इतने बेहतर ढंग से किया गया था कि स्पृश्य कहलाने वालों को भी आश्चर्य महसूस हुआ। इस परिषद के लिए खास कर मुंबई से ‘समता’ पत्र के संपादक श्री देवराव नाईक, श्री एस. एन. शिवतरकर, द. वि. प्रधान, शं. शा. गुप्ते, भा. र. कद्रेकर आदिलोग डॉ. अम्बेडकर के साथ आए हुए थे। कर्हाड से सब लोग जब चिपलूण आ रहे थे तब रास्ते में पड़ने वाले अडरे गांव में अस्पृष्य लोगों की ओर से छोटा-सा पान-सुपारी का कार्यक्रम हुआ। चिपलूण में अध्यक्ष और मुंबई से आए मेहमानों की व्यवस्था सरकारी डाकबंगले में की गई थी। शनिवार के दिन अधिवेशन की शुरुआत में मंडप में करीब आठ हजार लोग उपस्थित थे। शहर निवासी अन्य समाज के कई मान्यवर लोग भी उपस्थित हुए थे। उनमें खानसाहेब देसाई, श्री साठे, श्री विनायकराव बर्वे वकील, स्थानीय म्युनिसिपालिटी के अध्यक्ष श्री खातू, श्री राजाध्यक्ष, श्याम कवि, ओम् स्वामी, बेंडके पिता पुत्र आदि लोग दिखाई दे रहे थे। सभा के अध्यक्ष का चुनाव हुआ। उसके बाद परिषद के स्वागताध्यक्ष श्री रगजी के भाषण के पश्चात्, जब अधिवेशन के अध्यक्ष डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर भाषण देने के लिए खडे़ हुए तो वातावरण तालियों से गूंज उठा। जब उनका भाषण शुरू हुआ स्पृश्य और अस्पृश्य सभी बड़ी उत्कंठा से उनका भाषण सुनने लगे। डॉ. बाबासाहेब ने अपने भाषण में कहा,

”आज मैं जो भी कुछ अपने बंधुओं को सुनाने जा रहा हूं, उसकी जिम्मेदारी केवल मेरी नहीं है। मैं अध्यक्ष हूं, लेकिन आप लोगों से मैं जो कुछ कहना चाहता हूं उसमें मेरा कुछ नहीं है। दो साल पहले समाज के भाईयों के सामने मैंने जो कुछ कहा था, वही संदेश आज फिर दोहरा रहा हूं। मेरे संदेश के भीतर का उद्देष्य समाज ने स्वीकृत किया है, इसीलिए उसकी जिम्मेदारी मेरे अकेले की ना होकर आप सभी लोग उस जवाबदेही से बंधे हुए हैं। आज का संदेशा अपनी जाति का है, इसलिए एक विचार होकर आम सहमति से और जिम्मेदारी से मान्य किया गया संदेश, आप सभी को स्वीकार होगा, ऐसी मुझे भरपूर आशा है। यह जाति द्वारा सर्वसम्मति से स्वीकृत किया हुआ संदेश सभी को पूर्ण रूप से बंधनकारी है। यह संदेश इस तरह

* ”बहिष्कृत भारत“, 3 मई, 1929