25. गुलामी की व्यवस्था को नष्ट कर बुरे रीतिरिवाजों को तिलांजलि दो - अप्रैल 1929 चिपलून (रत्नागिरी ) - Page 168

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का है कि आज के इस अवसर पर हम क्या कर रहे हैं, और यहां किस उद्देष्य को हल करने के लिए इकट्ठा हुए हैं, आज के संदेश की जिम्मेदारी कौन-सी है, इस पर विचार-विमर्श करना आवष्यक है।

अखिल हिन्दू समाज ने वंष परंपरा से अपने समाज पर जिन मलिच्छ रीति-रिवाजों को जबरन थोपा है, उन्हें ठोकर लगाकर फेंक देना ही आज के संदेश का मुख्य उद्देश्य है। समग्रता से, सम्यक दृष्टि से विचार करने पर मेरे संदेष को बहुत अधिक महत्त्व है। इस भारत देश में बेहद गंदे जो काम हैं, जिन्होंने गंदगी फैलाई है उसे वे स्वयं ना करते हुए और वह कार्य व्यक्ति मात्र की खुशी-इच्छा पर करने के विकल्प ना रखकर, उन गंदे कामों को करने हेतु जबरन हमें करने हेतु बाध्य किया गया है, उन कामों को हम पर जबरन थोपा गया है, और इसी बाध्यता और जबरदस्ती का मैं विरोध करता हूं। वंश-परंपरागत जबरदस्ती का मैं विरोधक हूं।

इस तरह के परिवेश में, माहौल में, यदि कोई व्यक्ति योग्यता हासिल कर चाहे कितनी भी प्रगति क्यों ना कर ले, उन्नति के ऊँचे शिखर पर कितना भी ऊपर क्यों ना चढ़ ले, किन्तु उस व्यक्ति पर लगा गंदगी का, अस्पृश्यता का, हीनता का ठप्पा खत्म नहीं हो पाता। हीनता की इस दब्बू मानसिकता ने शरीर के कण-कण में अपनी पैठ बना ली है, इसलिए जब तक यह हीन भावना नष्ट नहीं हो जाती तब तक स्वाभिमान जागृत होना असंभव है। ”जन्म के आधार पर व्यवहार, यही तेरा धर्म है, और उसका पालन निष्ठा से करें“, यह उपदेश चमार, भंगी, महार, मांग आदि अस्पृश्यों को दिया जा रहा है। इस तरह के प्रतिकूल परिवेश में अस्पृश्य समाज में जुझारू, हिम्मत वाला, बुलंद विचारों वाला युग प्रवर्त्तक महापुरुश का निर्माण होना असंभव है।

ब्राह्मण आदि स्पृश्य जाति में जन्मा हुआ बच्चा मुन्सफ, मामलेदार, वकील आदि कैसे बन जाते हैं। मराठा समाज के बच्चे पुलिस और पुलिस अधिकारी के पद पर कैसे पहुंच जाते हैं? और उनकी तुलना में अस्पृश्य समाज के बच्चे युवा इस तरह हीन-दीन, मरियल, अशिक्षित, अयोग्य क्यों बन जाते हैं? अस्पृश्य और स्पृश्य बच्चों की उन्नति में यह भेद, यह अंतर किस वजह से हुआ है? इन सब गंभीर प्रश्नों का उत्तर एक ही है और वह है ”सामाजिक माहौल“, समाज का परिवेश। गंदगी भरे परिवेश और माहौल का असर, संस्कार अस्पृश्यों के बच्चों पर लगातार होने के कारण उन्हें गुलाम मानसिकता की दीक्षा उन्हें अनायास प्राप्त हो चुकी है। और यह परिवेश

खुशी-खुशी किया हुआ सौदा नहीं है। इसीलिए गुलामी का यह चलन नष्ट करना,

खत्म करना हमारा परम कर्त्तव्य है। और इस गुलामी को, इस घिनौने परिवेश को

खत्म करने हेतु इसे स्वीकृत करने वाले रीति-रिवाजों को ठोकर मार, उसे निकाल कर बाहर फेंकना यद्यपि आर्थिक दृष्टि से अहितकारी और बड़ा नुकसानदेह होगा