158 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
लोकल बोर्डस् राजी नहीं हैं। सो, अनिवार्य शिक्षा चींटी की चाल से आगे बढ़ रही है कहना अत्युक्ति नहीं होगी। 1920-21 साल तक इस क्षेत्र में छात्र-छात्राओं के प्राथमिक स्कूलों की संख्या 13000 से कम थी और इन विद्यालयों में पढ़ने वाले-छात्र छात्राओं की संख्या 8 लाख 1 हजार थी। 1926-27 में स्कूलों की संख्या 13835 और छात्र-छात्राओं की संख्या दस लाख से कुछ कम पायी गयी। 1920-21 से 1926-27 के दरमियान के पांच सालों में स्कूलों की संख्या में 4.8 प्रतिशत और छात्र-छात्राओं की संख्या में 14 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 1920-21 में प्राथमिक शिक्षा पर कुल 1 करोड़ 27 लाख रुपया खर्च हुआ और 1926-27 में एक करोड़ 98 लाख रुपए खर्च हुए। ये आंकडे भले ही उन्नतिदर्शक लगें लेकिन अगर बहुजन समाज में कितने बडे़ पैमाने पर निरक्षरता है इस पर ध्यान दें तो पता चलेगा कि उन्नति बेहद धीमी गति से चल रही है। 1921 की चंदावरकर कमेटी की रिपोर्ट की सिफारिशें अगर अमल में लाई जातीं तो आज तक अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा लागू करने में काफी उन्नति दिखाई देती। चंदावरकर कमेटी ने दस साल का कार्यक्रम तैयार किया था और अनुमान व्यक्त किया था कि उसे लागू करने के लिए करीब 1 करोड़ 10 लाख रुपयों तक सालाना खर्च करना पड़ सकता है। इनमें से 77 लाख रुपये सरकार को देने थे लेकिन आगे बढ़ता हुआ खर्चा ध्यान में लेते हुए इस अनुमानित राशि में बदलाव करना पड़ा। अनिवार्य शिक्षा सर्वत्र लागू करने क लिए 1 करोड़ 83 लाख रुपयों का सालाना अतिरिक्त खर्चा आएगा और उसमें से 1 करोड़ 21 लाख रुपये सरकार को देने पड़ेंगे यह आज का अनुमान है। अनिवार्य शिक्षा पर आने वाले कुल खर्चे में से जिला लोकल बोर्ड के हिस्से का दो तिहाई और म्युनिसीपालिटी के जिम्मे का आधा खर्चा वहन करने की जिम्मेदारी कानूनन सरकार पर डाली गई है। तथा ऐच्छिक शिक्षा के बारे में बनाई गई योजनाओं का
खर्चा उसी अनुपात में देने का आश्वासन भी सरकार ने दिया है। 1922-23 साल से प्राथमिक शिक्षा के बारे में मुंबई सरकार का खर्चे में मुंबई महापालिका का अनुदान जोड़ते हुए 28 लाख रुपयों की बढ़ोतरी हुई है। हालांकि, इस बढ़ोतरी का बहुत बडा हिस्सा अध्यापकों की तनख्वाह पर खर्च हो रहा है। अनिवार्य तथा ऐच्छिक शिक्षा की जो योजनाएं सरकार के सामने मदद की मांग करते हुए पेश की गई हैं, उनमें से केवल 6 लाख रुपये के खर्च की योजनाएं ही सिर्फ सरकार मंजूर कर पाई। कानून के प्रावधान के अनुसार अनिवार्य शिक्षा का कार्यक्रम पूरा करने के लिए और 1 करोड़ 72 लाख रुपयों का खर्चा होगा और उसमें से 1 करोड़ 15 लाख रुपए सरकार को देने पडे़गे। यह रकम मुहैया कराने के लिए सरकार को लोगों पर कर लगाने होंगे। चंदावरकर कमेटी ने इस बारे में भी सुझाव दिया था कि कौन-कौन से कर लगाए जा सकते हैं। लेकिन सरकार ने इस मामले में अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है। क्योंकि, एक तो प्रांतिक सरकार और वरिष्ठ सरकार के दरमियान महसूल