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के बंटवारे को लेकर खींचतान चल रही है। केंद्र सरकार से मुंबई सरकार के हिस्से हर साल अगर अधिक रकम आती है तो उतनी रकम के लिए चिंता खत्म हो जाएगी। अंदाजा यह भी लगाया जा रहा है कि साइमन कमीशन द्वारा भी कुछ सुझाव आएंगे। इसलिए अतिरिक्त कर लागू कर शिक्षा के लिए जरूरी अतिरिक्त रकम मुहैया कराए जाने की फिलहाल कोई उम्मीद नहीं। मेरी राय में अनिवार्य शिक्षा से संबंधित मसले के दो प्रमुख पहलु हैं। पहला, शिक्षा पर नियंत्रण और दूसरा, अनिवार्यता का तत्व लागू करने की जिम्मेदारी। इन दोनों मामलों में वर्तमान अनिवार्य शिक्षा संबंधी कानून में कुछ मूलभूत दोष हैं ऐसा हमें लगता है। स्थानिक स्वराज्य की सीमा का विस्तार करने के खिलाफ मैं नहीं हूं। लेकिन आज के हालात में शिक्षा स्थानिक स्वराज के कार्यक्षेत्र में शामिल होना ठीक नहीं। म्युनिसिपालिटी और लोकल बोर्ड में फिलहाल जो लोग चुन कर आते हैं, उनमें से कई लोग शिक्षा पर नियंत्रण रखने के लिए अयोग्य होते हैं। कइयों को शिक्षा का उद्देश्य और पद्धति के बारे में कोई जानकारी नहीं होती। इसके अलावा जातिभेद और पार्टी के भेद के कारण सदस्यों में प्रतिस्पर्धा होती है। और इस प्रतिस्पर्धा का असर विद्यालय के प्रबंधन और वातावरण पर होता है। अध्यापक वर्ग भी सदस्यों के साथ अपने फायदे के लिए या अपने बचाव के लिए सिफारिश गांठने के चक्कर में रहते हैं। सदस्यों को भी चुनाव के समय वोट पाने के लिए अध्यापकों की जरूरत होती है। इस झमेले के कारण विद्यालय में जिस तरह का अनुशासन लागू रहना चाहिए, वह नहीं रह पाता। मुंबई म्युनिसिपालिटी के स्कूलों के प्रबंधन में भी ऐसे मामले उजागर हुए हैं, तो फिर अन्य छोटी म्युनिसिपालिटियां और लोकल बोर्डों के नियंत्रण में होने वाले विद्यालयों में कामकाज कैसे चलता है, इस बारे में केवल कल्पना करना ही काफी है। आज के हालात में बेहद पिछडे़ अथवा अल्पसंख्यक लोगों के हितों की ठीक से रक्षा नहीं होती। कई जगहों पर अस्पृश्य वर्ग और मुसलमान वर्ग में से एक ही सदस्य होता है। म्युनिसिपालिटी के अथवा लोकल बोर्ड के कामकाज के दौरान उसे वतनदार बन चुके जातियों के सदस्यों के सामने लाचार होना पड़ता है। इन सभी बातों पर गौर करते हैं तो लगता है कि शिक्षा पर प्रांतिक सरकार का नियंत्रण रहना ही योग्य और जरूरी है। रास्ते बनाना, गटर साफ रखना, आदि बातों से शिक्षा का मामला अलग है। बारभाई का व्यवहार यहां किसी काम का नहीं। प्रांतिक स्वायŸाता की मांग करो और राष्ट्रीय नजरिए से शिक्षा की नीति तय कीजिए। हमें उससे कोई आपिŸा नहीं होगी। लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में काम सिलसिलेवार ढंग से होना चाहिए। शिक्षा बेहतरीन होनी चाहिए। जिस किसी को शिक्षा के क्षेत्र में हस्तक्षेप करने की सहूलियत नहीं होनी चाहिए। पिछले कुछेक सालों में कई स्थानीय स्वराज संस्थाओं में चल रहे अनुशासनहीन कामकाज का पर्दाफाश हो चुका है और सरकार को अस्थायी रूप से उन संस्थाओं के अधिकारों को निरस्त करना पड़ा है। अन्य मामलों में बेहिसाब कामकाज के कारण