27. मुंबई इलाके की प्राथमिक शिक्षा की प्रगति - मई 1929 महाबलेश्वर - Page 177

160 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

सार्वजनिक संपिŸा का ही नुकसान होगा, लेकिन शिक्षा के कामकाज में अगर गलत ढंग से कामकाज चले तो नई पीढ़ी का नुकसान होगा, इस बात को कभी भी नहीं भूलना चाहिए। इसके अलावा शिक्षा पर प्रांतिक सरकार का ही नियंत्रण होना क्यों जरूरी है, इस बात की पुष्टि में एक और महत्वपूर्ण मुद्दा दिया जा सकता है। वह यह कि शिक्षा पर 80 प्रतिशत से अधिक खर्चा प्रांतिक सरकार ही करती है। उसी तरह प्राथमिक शिक्षा को सब तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी सरकार पर ही होनी चाहिए। हाल के अनिवार्य शिक्षा कानून के अनुसार सरकार ने अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की ज्यादातर जिम्मेदारियां लोकल बोर्ड और म्युनिसिपालिटियों पर डाल दी हैं। प्राथमिक शिक्षा के कुल खर्च में से लोकल बोर्ड के लिए दो तिहाई और म्युनिसिपालिटी के लिए आधे खर्चे की जिम्मेदारी कुछ ज्यादा है क्योंकि लोकल बोर्ड और म्युनिसिपालिटियों की आर्थिक हालत ठीक नहीं है और उनमें से ज्यादातर जितना बोझ अब उठा रहे हैं, उससे अधिक बोझ उठा नहीं पाएंगे। आमदनी बढ़ाने के, नए खर्चे उठाने के पर्याप्त साधन भी उनके पास नहीं हैं। इसलिए, इच्छा के बावजूद कई लोकल बोर्ड और म्युनिसिपालिटियां अनिवार्य शिक्षा की योजना पर काम नहीं करना चाहते। इसके अलावा जिन लोकल बोर्ड और म्युनिसिपालिटियों में शिक्षित लोगों की संख्या अधिक होती है, उन्हें अनिवार्य शिक्षा योजना से कोई लेना-देना नहीं होता। अनिवार्य किए बिना ही उनकी जाति में शिक्षा का प्रचार प्रसार होता रहता है। इसलिए, जो जातियां शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ी हुई हैं उन्हें पढ़ाने-लिखाने का जिम्मा उठा कर समाज में अपने वर्चस्व को वे क्यों संकट में डालेंगे? ये तो अपने ही पैरों पर कुल्हाडी मारने जैसा हुआ। इन दो अड़चनों के कारण अनिवार्य शिक्षा का कानून बन कर इतने साल बीतने के बाद भी इस क्षेत्र में ज्यादा विकास नहीं हो पाया है। लोगों को साक्षर बनाना, निरक्षरता को देश निकाला करना प्रांत सरकार की जिम्मेदारी है, जिससे वह कभी भी मुंह नहीं मोड़ सकती। उसने अगर इस जिम्मेदारी को निभाने से आना-कानी की तो कह सकते हैं कि सरकार ने अपने एक पवित्र कर्त्तव्य को निभाने से मुंह मोड़ा। जिस सरकार को अपनी इस जिम्मेदारी का, अपने पवित्र कर्तव्य का अहसास होता है वह कभी अपनी जिम्मेदारी को टालती नहीं। अनिवार्य शिक्षा का मसला ऐसा नहीं है, जिसे कभी कभार कोशिश कर हल किया जा सके। लगातार कोशिश करके उस पर काम किया जाना चाहिए, उसे हल किया जाना चाहिए। शिक्षा के क्षेत्र में पूरे प्रांत की एक -सी उन्नति की अगर उम्मीद हो तो प्रांत सरकार को ही पूरी जिम्मेदारी उठानी होगी। सभी लोकल बोर्ड और म्युनिसिपालिटियों की आर्थिक स्थिति एक-सी नहीं होती। हालात के मुताबिक उनकी आय के साधन कम या अधिक होते हैं। उर्वर जमीन, व्यापार, उद्यम, कल-कारखाने, मिलें, यात्रा आदि के अनुकूल किसी के पास आय के पुख्ता साधन होते हैं तो तो कइयों की आय उनके साधारण खर्चे के लिए भी नाकाफी होती है और आय बढ़ाना