27. मुंबई इलाके की प्राथमिक शिक्षा की प्रगति - मई 1929 महाबलेश्वर - Page 178

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उनके लिए संभव नहीं होता। हर जिले को अपनी साधनसंपिŸा लगा कर अनिवार्य शिक्षा की योजना लागू करनी चाहिए, ऐसा अगर कहा जाए तो रत्नागिरी, पंचमहाल जैसे आय के साधन वंचित जिलों को प्रलय आने तक इंतजार करना होगा। ऐसे इलाकों को उनकी आर्थिक दरिद्रता के कारण अनिवार्य शिक्षा से वंचित रखना क्या उचित होगा? इसीलिए, यह प्रांत सरकार की ही जिम्मेदारी है। अगर इसे मान भी लिया जाए तब भी एक सवाल बचा ही रहता है कि पूरे प्रांत में अनिवार्य शिक्षा योजना लागू करने के लिए जरूरी धन कहां से लाया जाए? प्रांत सरकार और हिंदुस्तान सरकार के बीच अगर आर्थिक लेनदेन हो तो मुंबई सरकार को शिक्षा पर

खर्च करने के लिए कुछ अतिरिक्त रकम मिल सकती है। इसके अलावा, प्राथमिक शिक्षा अगर अनिवार्य कर भी दी जाए तब भी सब मुफ्त रखा जाए ऐसा हमें नहीं लगता। प्राथमिक विद्यालयों में नाममात्र फीस ली जाती है। जिनकी फीस देने की हैसियत हो उनसे जरूर फीस ली जानी चाहिए। इंग्लैंड में जब अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा लागू की गई थी, तब वह सबके लिए मुफ्त नहीं रखी गई थी। मुफ्त शिक्षा देना बाद की बात है उसे अनिवार्य बनाना पहली शर्त है। समाज के जिन वर्गों को इतनी कम फीस देना भी संभव नहीं होता, केवल उनके लिए वह मुफ्त रखी जाए। उदारता से फीस माफी की जाए। लेकिन जिन लोगों को फीस देना संभव है, उनसे फीस वसूलना न तो पाप है और न ही कोई अन्याय है। अगर इस प्रकार थोड़ी भी फीस वसूली हो तो अनिवार्य शिक्षा को लागू करने का कुछ तो खर्चा जुट जाएगा। वर्तमान द्विदल राजनीति के कारण एक तरफ तो शिक्षा का खर्च बढ़ा है तो दूसरी तरफ अबकारी उत्पादन कम कर, शराब की बिक्री पर पाबंदी लगाने की नीति पर अमल करने की मांग लोगों से की जा रही है। इससे विभागों के खर्चे को पूरा करने का सवाल आन पड़ा है। शराबबंदी की नीति और शिक्षा का प्रसार दोनों पर अमल करना लगभग नामुमकिन हो चला है। अनिवार्य शिक्षा को लागू करने के लिए लोगों पर अतिरिक्त कर लगाए जाने चाहिए और शराबबंदी की नीति पर अमल करने के लिए भी कर लागू किए जाने चाहिए। करों का दुगुना बोझ उठा पाने में जनता कितनी सक्षम है, इस बारे में हमें आशंका है। वैसे, ये दोनों सुधार लागू करना बेहद जरूरी होने के कारण, तथा इनके मीठे फल एक पीढ़ी के बाद ही सही, सभी जनता को चखने को मिलेंगे इस बात का यकीन होने के कारण अन्य मामलों में हरसंभव बचत करने के लिए सरकार को मजबूर कर खुद भी करों का बोझ सिर पर लेने के लिए तैयार रहने में ही समझदारी है। हालांकि, अगर कोई हमसे यह पूछे कि पहले शराब पर पाबंदी लगाएं या पहले ‘अनिवार्य शिक्षा’ को लागू किया जाए तो हम यही कहेंगे कि पहले अनिवार्य शिक्षा को ही लागू किया जाना चाहिए। शिक्षा का सार्वजनिक प्रसार होने से शराब पर पाबंदी लगाना आसान हो जाएगा। इतना ही नहीं, शराब पर पाबंदी लगाने की लोगों की मांग जोरदार ढंग से व्यक्त होगी,