30. सभी अस्पृश्यों को हम समान मानते हैं - जून 1929 परेल (मुंबई) - Page 185

168 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

”आज जैसी आपात स्थितियां हैं, ऐसे में हम सभी अस्पृश्यों को संगठित होकर रहना होगा। दुख की बात यह है कि हम में से कुछ लोग महार-बिगर महार का विवाद पैदा करते हैं!! महार लोगों में अगर महाड़ के चवदार तालाब के लिए अपने प्रतिस्पर्द्धियों (विरोधियों) के साथ संघर्ष किया और उस तालाब पर उन्होंने अपना अधिकार मनवा लिया तो उस तालाब का पानी चमार और मांग भी पी सकते हैं! इसलिए, हम सब जब तक एक होकर नहीं लड़ते, तब तक हमारा टिक पाना संभव नहीं है! इतना ही नहीं अपनी संस्था की ओर से इस इलाके में जो-जो बोर्डिंग शुरू हैं उनमें किसी तरह का भेदभाव नहीं है, किसी भी अस्पृश्य जाति के बच्चे को छात्र को उसमें प्रवेश मिलता है। सभी अस्पृश्य जाति के छात्र इस बोर्डिंग में रहते हैं।

खुद के स्वार्थ के लिए कुछ चमार लोग महारों के खिलाफ बिना-वजह हल्ला मचा कर खुद को धन्य मान रहे हैं। असल में हमारा आंदोलन जिस उद्देश्यों पर चल रहा है, उससे महाराष्ट्र के अन्य आंदोलनों के प्रमुखों को, कर्ता-धर्ताओं को सबक लेना चाहिए। पुणे, सोलापुर की म्युनिसिपालिटी के चुनावों में इन दोनों जगहों पर मैंने खुद कोशिशें कर महार उम्मीदवारों से अपने नामांकन वापिस लेने के लिए कहा है। और उन्होंने अपने नामांकन वापिस ले भी लिए हैं। इन दोनों म्युनिसिपालिटियों में मैंने चमार उम्मीदवार ही जीत कर जाएं इस पर खास ध्यान दिया है। इससे यह बात ध्यान में आएगी कि सभी अस्पृश्यों को हम समान मानते हैं। फिर उसमें जाति या प्रांत के आधार पर भेदभाव करने की हमें कोई जरूरत नहीं लगती। हालात की तलवार, सिलबट्टा सबके सिर पर कमोबेश एक-सा है।“ आखिर अध्यक्ष के प्रति धन्यवाद ज्ञापन के बाद और फूलमालाएं अर्पण करने के बाद सभा बर्खास्त हुई।