31. मजदूरों की कोई जाति नहीं होती कहने वाले स्पृश्य नेता इसका जवाब दें - अक्तूबर 1929 परेल (मुंबई) - Page 186

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मजदूरों की कोई जाति नहीं होती कहने वाले स्पृश्य नेता इसका

जवाब दें

डॉ. अम्बेडकर की अध्यक्षता में पर्वती, पुणे के सत्याग्रह आंदोलन के समर्थन में बुधवार, दिनांक 16 अक्तूबर, 1929 को शाम 6.30 बजे परेल मुंबई में बहिष्कृत वर्ग की एक बड़ी सार्वजनिक सभा आयोजित की गई थी। पूरा सभागार लोगों से

खचाखच भरा हुआ था। मंच पर श्री. भुस्कुटे, देवराव नाईक, ठाकरे, प्रधान, खांडके, कवली, कद्रेकर, आचार्य डॉ. सुरतकर आदि स्पृश्य लोग और साथ ही श्री. शिवतरकर, माली, आडरेकर, आदि अस्पृश्य मंडली भी दिखाई दे रही थी। श्री. शिवतरकर ने डॉ. अम्बेडकर के अध्यक्ष स्थान स्वीकारने का प्रस्ताव रखा और श्री. खांडके ने उसका समर्थन किया। उसके बाद तालियों की गड़गड़ाहट के बीच डॉ. अम्बेडकर ने अध्यक्ष स्थान ग्रहण किया।

”अपने भाषण की शुरुआत में डॉ. अम्बेडकर जी ने पुणे के सत्याग्रह का इतिहास संक्षेप में बताया। उन्होंने कहा कि, पुणे में बहिष्कृतों द्वारा किए जा रहे सत्याग्रह की सभी बहिष्कृतों द्वारा जहां तक संभव हो सके मदद करना सबका पवित्र कर्त्तव्य है। उन्होंने जब लोगों से पूछा कि, जरुरत पड़ने पर क्या आप पुणे जाने के लिए तैयार हैं? तो चारों तरफ से हां की ध्वनि गूंज उठी।

स्पृश्य लोगों के बर्ताव के प्रति और और बहिष्कृतों के बारे में उनके नजरिए के प्रति निषेध व्यक्त कर उन्होंने कहा कि और कुछ दिन रुके रहो और समाज के मत परिवर्तन की राह देखें, कहने वालों का मन कितना नीच होता है। काँग्रेस ने भी जब अंग्रेजों को चेतावनी दी है कि 31 दिसंबर से पहले अगर ‘डोमिनियन स्टेटस’ नहीं दिया गया तो अंग्रेज सŸा से संबंध विच्छेद किए जाएंगे, तो ऐसे में बहिष्कृत वर्ग को भुलावे में रखने की कोशिश करने के क्या मायने हैं? इससे तो, हजारों सालों के इंतजार के बाद भी कुछ न देने वाले स्पृश्यों के मन की नीचता ही उजागर होती है। रुकने के लिए कहना उनका लुका-छुप्पी का खेल है, उनके नीच मन पर चढ़ा अच्छाई का झूठा मुलम्मा है। लेकिन ऐसी झूठी बातों में फंसने के लिए अस्पृश्य वर्ग अब उतना नादान नहीं रहा है। वह अब जाग गया है। उसका स्वाभिमान अब जागृत हो चुका है। पुणे का सत्याग्रह इसी का एक प्रत्यक्ष रूप है। जल्द ही मुंबई में मंदिर प्रवेश के सत्याग्रह की मुहिम शुरू की जा रही है और उसे सफल बनाने के लिए मुंबई के बहिष्कृतों को भी कमर कस कर, उनके साथ खडे़ हो जाना चाहिए।“

* बहिष्कृत भारत : 15 नवंबर, 1929